शाम के साढ़े सात बजे हैं। रसोई में कुकर ने तीसरी सीटी दे दी है, घर में तड़के की ख़ुशबू फैली है, और सोफ़े पर दो साल की एक बच्ची फ़ोन को चेहरे के बिल्कुल पास पकड़े चुपचाप बैठी है। एक ही कार्टून गाना चौथी बार बज रहा है। उसका अँगूठा चलता है, रंग बदलते हैं, और दादी उसका नाम पुकारती हैं तो वह सिर तक नहीं उठाती। दिन भर में पहली बार घर में शांति है। इस दृश्य में कोई बुरा माँ-बाप नहीं है। सब थके हुए हैं, और फ़ोन काम कर जाता है।
छोटे बच्चे वाले लगभग हर भारतीय घर में यह पल आता है। इसके बारे में शोध जो बताता है, वह हमारी सुनी-सुनाई बातों से कम डरावना है, पर कहीं ज़्यादा काम का है।
अध्ययन क्या कहते हैं
पहले सलाह की बात करें। 2019 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि एक साल से छोटे बच्चे को स्क्रीन बिल्कुल नहीं दिखानी चाहिए, एक साल के बच्चे का बैठे-बैठे स्क्रीन देखना ठीक नहीं, और दो से चार साल के बच्चे के लिए दिन में एक घंटे से ज़्यादा नहीं। जितना कम, उतना अच्छा। इंडियन एकेडमी ऑफ़ पीडियाट्रिक्स ने 2022 में एक कदम आगे बढ़कर कहा कि दो साल से छोटे बच्चे को किसी भी तरह की स्क्रीन के सामने नहीं रखना चाहिए, और दो से पाँच साल तक बड़ों की निगरानी में ज़्यादा से ज़्यादा एक घंटा।
इन सलाहों के पीछे ऐसे अध्ययन हैं जो एक ही बच्चों को सालों तक देखते रहे। कनाडा के कैलगरी शहर में शेरी मैडिगन और उनके साथियों ने क़रीब 2,400 बच्चों पर नज़र रखी। दो साल की उम्र में जिनका स्क्रीन समय ज़्यादा था, तीन साल पर विकास की जाँच वाली प्रश्नावली में उनके अंक कम आए। तीन साल पर ज़्यादा स्क्रीन का संबंध पाँच साल पर कम अंकों से दिखा। उल्टी दिशा का संबंध नहीं मिला। जापान में इप्पेई ताकाहाशी और उनकी टीम ने सात हज़ार से ज़्यादा माँ-बच्चे के जोड़ों को देखा। जो एक साल के बच्चे रोज़ चार घंटे या उससे ज़्यादा स्क्रीन देखते थे, दो साल की उम्र में उनमें बोलने-समझने में पिछड़ने की आशंका कई गुना ज़्यादा थी। चार साल पर भी यह संबंध कमज़ोर रूप में बना रहा।
जहाँ शोध की पहुँच ख़त्म होती है
यहाँ ईमानदारी ज़रूरी है। ये सब देखकर दर्ज किए गए आँकड़ों पर टिके अध्ययन हैं, प्रयोग नहीं। स्क्रीन का समय माता-पिता ने ख़ुद बताया, और विकास वाली प्रश्नावली भी उन्होंने ही भरी। यह प्रश्नावली जाँच का एक शुरुआती साधन है, किसी कमी की पक्की पहचान नहीं। मैडिगन के अध्ययन में असर छोटा था। ताकाहाशी की टीम यह अलग नहीं कर पाई कि बच्चा पढ़ाई वाला कार्यक्रम देख रहा था या कुछ और। यह भी हो सकता है कि जो बच्चा पहले से किसी मुश्किल में है, उसी के हाथ में फ़ोन ज़्यादा थमाया जाता हो। कोई प्रश्नावली इस उलझन को पूरी तरह नहीं सुलझा सकती।
2020 में मैडिगन के समूह ने स्क्रीन और भाषा पर हुए 42 अध्ययनों को एक साथ परखा। ज़्यादा स्क्रीन समय और पीछे लगातार चलते टीवी के साथ बच्चों की भाषा कमज़ोर दिखी। पर शैक्षिक कार्यक्रमों और किसी बड़े के साथ बैठकर देखने के साथ भाषा बेहतर दिखी, और जिन बच्चों ने देर से स्क्रीन देखनी शुरू की, वे भी आगे रहे। शोधकर्ताओं ने ख़ुद माना कि ये संबंध छोटे से मध्यम हैं, और यह भी कि छपे हुए अध्ययनों में एक तरफ़ झुकाव के संकेत हैं। यानी शोध सावधानी और सीमा का समर्थन करता है, घबराहट का नहीं। वह यह नहीं कहता कि स्क्रीन बच्चे के दिमाग़ को वैसे ही नुक़सान पहुँचाती है जैसे धुआँ फेफड़ों को।
स्क्रीन पलटकर जवाब नहीं देती
इस बहस पर सबसे ज़्यादा रोशनी डालने वाले अध्ययन घंटों के बारे में हैं ही नहीं। 2003 में पैट्रिशिया कुहल और उनके साथियों ने क़रीब नौ महीने के बच्चों को मंदारिन चीनी भाषा के बारह छोटे सत्र दिए। जिन बच्चों के सामने कोई जीता-जागता व्यक्ति बोल रहा था, वे मंदारिन की ध्वनियों में फ़र्क करने लगे। जिन्होंने उसी व्यक्ति को वीडियो पर देखा, उनमें ऐसी कोई सीख नहीं दिखी। दस साल बाद सारा रोज़बेरी, कैथी हर्ष-पासेक और रॉबर्टा गोलिंकॉफ़ ने दो साल के बच्चों को नई क्रियाएँ सिखाईं। बच्चों ने सामने बैठे व्यक्ति से भी सीखा और वीडियो कॉल से भी, पर उसी शिक्षक की रिकॉर्ड की हुई वीडियो से नहीं।
फ़र्क काँच की स्क्रीन का नहीं था। फ़र्क जवाब का था। वीडियो कॉल पर बैठा व्यक्ति रुकता है, बच्चे को देखता है, उसकी बात का जवाब देता है। रिकॉर्डिंग अपनी धुन में चलती रहती है, बच्चा चाहे जो करे। शरीर से जुड़ा संज्ञान (embodied cognition) का विचार हमें यही बताता आया है। छोटा बच्चा भाषा को आवाज़ों की धारा की तरह नहीं निगलता। वह इसे दो शरीरों के बीच चलने वाले लेन-देन में सीखता है, जिसमें सिर का मुड़ना, एक ठहराव और ठीक वक़्त पर आई मुस्कान, सब शामिल हैं। शोधकर्ता इसे साथ मिलकर अर्थ बनाना (participatory sense-making) कहते हैं। दादी-नानी इसे बच्चे से बतियाना कहती हैं।
सवाल मिनटों का नहीं है
स्क्रीन पर ज़्यादातर बहस आज भी समय और नतीजों की बहस है। कितने मिनट, ध्यान पर कितना बुरा असर, आगे चलकर अंकों पर क्या फ़र्क। इस नज़रिए में बच्चा एक मशीन है जिसकी पैदावार हम बचाने में लगे हैं। मैं सवाल को दूसरी तरह रखना चाहता हूँ। दो साल का बच्चा एक ऐसा शरीर है जो हिलने-डुलने से सीखता है, आसपास के लोगों की नक़ल से सीखता है, उन चीज़ों से खेलकर सीखता है जो पलटकर कुछ करती हैं। सोफ़े वाले फ़ोन की असली क़ीमत सिर्फ़ वह नहीं जो वह करता है। असली क़ीमत वह है जिसकी जगह वह ले लेता है, यानी वह घंटा जिसमें कोई बच्चे को जवाब देता।
इसका मतलब यह नहीं कि थकी हुई माँ ग़लत है। मतलब यह है कि उपाय अपराध-बोध नहीं, साथ है। बच्चे के पास बैठिए, जो आप दोनों देख रहे हैं उसका नाम लीजिए, वीडियो रोकिए और उससे कहिए कि हाथों से करके दिखाए।
तो फिर उसी सोफ़े पर लौटिए, शाम के साढ़े सात बजे। घर में शांति है। आपके घर या आपकी कक्षा में ऐसा क्या बदले कि यह शांति उस बच्चे से आए जिसे दिन भर जवाब मिलते रहे, न कि उस बच्चे से जिसने पूछना ही छोड़ दिया?
अभ्यास में उतारें: P22 Call and response: language through rhythm, P51 Free play: what the teacher does while children play, P17 Finger games for small hands
आगे पढ़ें: R10 Participatory sense-making: how two bodies understand together, R42 Imitation: children learn by becoming others
संदर्भ (Notes)
- World Health Organization (2019). Guidelines on physical activity, sedentary behaviour and sleep for children under 5 years of age. Geneva: WHO. Summary in the news release “To grow up healthy, children need to sit less and play more”, 24 April 2019. https://www.who.int/news/item/24-04-2019-to-grow-up-healthy-children-need-to-sit-less-and-play-more
- Gupta, P., Shah, D., Bedi, N., et al. (2022). Indian Academy of Pediatrics Guidelines on Screen Time and Digital Wellness in Infants, Children and Adolescents. Indian Pediatrics, 59(3), 235–244.
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