Roots · The developing body

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नकल: बच्चे दूसरों जैसे बनकर सीखते हैं

रसोई में घी की खुशबू है और तवे की हल्की-सी सनसनाहट। दादी पीढ़े पर बैठी चकले पर रोटियाँ बेल रही हैं। पास में ज़मीन पर उनकी तीन साल की पोती बैठी है, जिसे आटे की एक छोटी-सी लोई मिल गई है। उसे कोई कुछ नहीं सिखा रहा। कोई नहीं बता रहा कि कहाँ दबाना है। वह बस दादी के हाथ देखती है, फिर अपनी हथेलियों से लोई दबाती है, नन्हा-सा बेलन आगे-पीछे चलाती है और दादी की तरह लोई को ज़रा घुमा देती है। फिर वह कलाई के पिछले हिस्से से माथा पोंछती है, ठीक वैसे ही जैसे दादी ने अभी-अभी पोंछा था। उसके माथे पर न आटा है, न पसीना। रोटी टेढ़ी-मेढ़ी बनी। कलाई एकदम सही चली।

नकल का मतलब क्या है

हम में से ज़्यादातर ने बचपन में ही सीख लिया था कि नकल सीखने का सबसे घटिया तरीका है। हर बच्चा बहुत जल्दी “नकल मत करो” सुन लेता है, और साथ में यह भी मान लेता है कि नकल कमज़ोर बच्चे करते हैं और होशियार बच्चे समझते हैं। पर रसोई वाली उस बच्ची को एक बार फिर देखिए। वह बाहर से कोई आकृति नहीं उतार रही। वह दादी के हाथ चलाने के ढंग को भीतर से अपने शरीर में उतारकर आज़मा रही है। कुछ मिनटों के लिए वह दादी बन जाती है। इस अर्थ में नकल सोचने से बचने का रास्ता नहीं है। यह बच्चे के सोचने के सबसे पहले तरीकों में से एक है, जिसमें सिर अकेला नहीं, पूरा शरीर शामिल होता है। शरीर से जुड़े संज्ञान (embodied cognition) की बड़ी बात भी यही है।

शोध क्या कहता है, और कहाँ चुप है

1977 में एंड्रयू मेल्ट्ज़ॉफ़ और एम. कीथ मूर ने बताया कि 12 से 21 दिन के शिशु किसी बड़े को जीभ निकालते, मुँह खोलते, होंठ आगे करते या उँगलियाँ हिलाते देखकर वैसा ही करते हैं। फिर 2016 में जैनीन ऊस्टनब्रुक और उनके साथियों ने सौ से ज़्यादा शिशुओं को उनके पहले नौ हफ़्तों में बार-बार परखा। उन्हें इसका कोई भरोसेमंद सबूत नहीं मिला कि नवजात शिशु चेहरे, इशारे या आवाज़ की नकल करते हैं। उनके नतीजे जीन पियाजे की उस पुरानी बात के ज़्यादा करीब बैठते हैं कि नकल पहले साल में धीरे-धीरे बनती है। ईमानदारी से कहें तो नवजात की नकल पर अभी बहस जारी है, और कक्षा के लिए कोई दावा इस पर नहीं टिकाना चाहिए।

इसके थोड़ा बाद की तस्वीर कहीं ज़्यादा साफ़ है। 1988 में मेल्ट्ज़ॉफ़ ने 14 महीने के बच्चों के सामने एक बड़े व्यक्ति को माथे से छूकर एक बत्ती वाला पैनल जलाते दिखाया। बच्चों को उसे छूने नहीं दिया गया। एक हफ़्ते बाद लौटने पर बारह में से आठ बच्चों ने ठीक यही अनोखा काम किया, जबकि तुलना वाले समूहों में एक भी बच्चे ने ऐसा नहीं किया। फिर जॉर्जी गेर्गेली, हैरल्ड बेकरिंग और इल्डिको किराय ने इसमें एक मोड़ जोड़ा। जब दिखाने वाली के हाथ खाली थे, तो लगभग दस में से सात बच्चों ने माथे से छुआ। जब उसके दोनों हाथ बदन पर लिपटा कंबल थामे हुए थे, तो पाँच में से लगभग एक ही बच्चे ने ऐसा किया और बाकी ने सीधे हाथ लगा दिया। यानी पहले दो साल में ही बच्चा अपने शरीर से यह पूछने लगता है कि सामने वाले ने ऐसा क्यों किया।

तीन-चार साल की उम्र तक यह नकल लगभग ज़िद बन जाती है। विक्टोरिया हॉर्नर और एंड्रयू व्हाइटन ने चिंपैंज़ियों और तीन-चार साल के बच्चों को एक डिब्बे से इनाम निकालना दिखाया, जिसमें कुछ कदम किसी काम के नहीं थे। जब डिब्बा पारदर्शी था, तो चिंपैंज़ियों ने बेकार कदम छोड़ दिए। बच्चों ने नहीं छोड़े। डेरेक लायंस, एंड्रयू यंग और फ़्रैंक कील ने पाया कि तीन से पाँच साल के बच्चे साफ़ मना करने के बाद भी गैरज़रूरी कदम दोहराते रहे। मनोवैज्ञानिक इसे ज़रूरत से ज़्यादा नकल (overimitation) कहते हैं। मार्क नील्सन और कीयन टोमासेली को यह ज़रूरत से ज़्यादा नकल कालाहारी के बुशमैन बच्चों में भी वैसी ही मिली जैसी एक बड़े औद्योगिक शहर के बच्चों में।

यह बच्चे को देखने का नज़रिया कैसे बदलता है

कोई बच्चा साफ़-साफ़ बेकार चीज़ की नकल क्यों करेगा? एक जवाब यह है कि वह सिर्फ़ डिब्बा खोलना नहीं सीख रहा। वह यह सीख रहा है कि यहाँ काम कैसे होता है। माथे पर कलाई फेरना कोई गलती नहीं, वह उस घर में रोटी बनाने के ढंग का हिस्सा है। बारबरा रोगॉफ़ और उनके साथी ऐसे समुदायों के बारे में लिखते हैं जहाँ बच्चे बड़ों के असली काम को ध्यान से देखकर और उसमें हाथ बँटाकर सीखते हैं। वे यह भी बताते हैं कि घर में बच्चे की शुरुआती भाषा अक्सर इसी तरह आती है। हमारे समेत कई देशों की स्कूली व्यवस्था ने इसकी जगह अलग से पढ़ाए जाने वाले पाठ चुने। फिर हम हैरान होते हैं कि जिस बच्चे ने घर में पूरी बोली-भाषा यूँ ही पकड़ ली, उसे किताब से सीखना इतना धीमा क्यों लगता है।

इस बात का एक कड़वा पहलू भी है। अल्बर्ट बैंडुरा के मशहूर प्रयोग में स्टैनफ़र्ड के नर्सरी स्कूल के बच्चों ने एक बड़े को “बोबो” नाम की बड़ी गुड़िया को मारते और उस पर चिल्लाते देखा। बाद में अकेले छोड़े जाने पर उन्होंने भी गुड़िया को मारा, चिल्लाए और उस बड़े के वही शब्द दोहराए। बच्चे सिर्फ़ वह नहीं सीखते जो हम सिखाना चाहते हैं। वे शिक्षक का धीरज भी ले लेते हैं और उसकी झुँझलाहट भी, किताब पकड़ने का ढंग भी और छड़ी पकड़ने का ढंग भी।

यह नज़रिया अलग कहाँ है

शिक्षा में नकल के पक्ष में आम दलील काम निकालने वाली होती है। सही तरीका करके दिखाओ, बच्चे नकल करेंगे, नतीजे सुधरेंगे। जहाँ तक यह बात जाती है, ठीक है। पर यहाँ बात कुछ और है। नकल हमें बताती है कि सीखने वाला असल में है क्या। बच्चा कोई बंद दिमाग नहीं जो बस निर्देश ले रहा हो। वह एक खुला शरीर है जो अपने आसपास के शरीरों का आकार लेता चलता है, और सीखना अपनी जड़ में कुछ बनने की प्रक्रिया है। अगर ऐसा है, तो शिक्षक का शरीर कभी तटस्थ नहीं होता। उसका उठना-बैठना, उसकी आवाज़, उसकी हड़बड़ी या उसका ठहराव, यह सब पहले से एक पाठ है, उस छिपे पाठ्यक्रम (hidden curriculum) का बड़ा हिस्सा जो किसी टाइमटेबल में नहीं लिखा होता।

छुट्टी की आखिरी घंटी के बाद किसी बरामदे में बच्चों को स्कूल-स्कूल खेलते देखिए। उनमें से एक हमेशा “मैडम” बनती है। उसकी आवाज़ सुनिए, देखिए वह हाथ कहाँ रखती है, और गौर कीजिए कि जब “क्लास” बात नहीं मानती तो वह क्या करती है। यह सब उसने बिना एक भी पाठ के सीखा है। तो जब हम मानते हैं कि हम सिर्फ़ गणित पढ़ा रहे हैं, तब असल में हम क्या पढ़ा रहे होते हैं?

इसे कक्षा में आज़माएँ: P30 Mirror and shadow: learning by imitation; P22 Call and response: language through rhythm; P36 Telling a story with the body

आगे पढ़ें: R10 Participatory sense-making: how two bodies understand together; R43 Play: the body’s own curriculum

संदर्भ (Notes)

  1. Meltzoff, A. N., & Moore, M. K. (1977). Imitation of facial and manual gestures by human neonates. Science, 198(4312), 74–78. https://doi.org/10.1126/science.897687
  2. Oostenbroek, J., Suddendorf, T., Nielsen, M., Redshaw, J., Kennedy-Costantini, S., Davis, J., Clark, S., & Slaughter, V. (2016). Comprehensive longitudinal study challenges the existence of neonatal imitation in humans. Current Biology. https://doi.org/10.1016/j.cub.2016.03.047
  3. Meltzoff, A. N. (1988). Infant imitation after a 1-week delay: Long-term memory for novel acts and multiple stimuli. Developmental Psychology, 24(4), 470–476.
  4. Gergely, G., Bekkering, H., & Király, I. (2002). Rational imitation in preverbal infants. Nature, 415(6873), 755. https://doi.org/10.1038/415755a
  5. Horner, V., & Whiten, A. (2005). Causal knowledge and imitation/emulation switching in chimpanzees (Pan troglodytes) and children (Homo sapiens). Animal Cognition, 8, 164–181. https://doi.org/10.1007/s10071-004-0239-6
  6. Lyons, D. E., Young, A. G., & Keil, F. C. (2007). The hidden structure of overimitation. Proceedings of the National Academy of Sciences, 104(50), 19751–19756. https://doi.org/10.1073/pnas.0704452104
  7. Nielsen, M., & Tomaselli, K. (2010). Overimitation in Kalahari Bushman children and the origins of human cultural cognition. Psychological Science, 21(5), 729–736. https://doi.org/10.1177/0956797610368808
  8. Rogoff, B., Paradise, R., Mejía Arauz, R., Correa-Chávez, M., & Angelillo, C. (2003). Firsthand learning through intent participation. Annual Review of Psychology, 54, 175.
  9. Bandura, A., Ross, D., & Ross, S. A. (1961). Transmission of aggression through imitation of aggressive models. Journal of Abnormal and Social Psychology, 63, 575–582.

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