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खुला खेल: जब बच्चे खेलते हैं, तब शिक्षक क्या करे

वह पल

घंटी बजती है और पल भर में कक्षा खाली हो जाती है। आँगन में धूल उड़ने लगती है, जहाँ कुछ बच्चे एक पुराना टायर लुढ़का रहे हैं। पेड़ के नीचे दो लड़कियाँ टहनियों और खपरैल के एक टूटे टुकड़े से घर बना रही हैं, उनकी धीमी-धीमी आवाज़ें आ रही हैं। दीवार से सटकर एक लड़का जेबों में हाथ डाले खड़ा है, बस देख रहा है। शिक्षिका चाय का कप और कॉपियों का गट्ठर लेकर सीढ़ियों पर बैठ जाती हैं। बीस मिनट बाद ग्यारह कॉपियाँ जँच चुकी होती हैं, पर आँगन में क्या हुआ, यह उन्होंने लगभग देखा ही नहीं।

हम में से ज़्यादातर लोग कभी न कभी उन सीढ़ियों पर बैठे हैं। लेकिन उस आँगन में जो सीखना चल रहा होता है, वह किसी कॉपी में नहीं दिखेगा।

अभ्यास

शुरुआत इससे कीजिए कि खुले खेल (free play) को दिन में पक्की जगह मिले, बीस से तीस मिनट, आठ साल से छोटे बच्चों के लिए रोज़ और बड़े बच्चों के लिए हफ़्ते में कम से कम तीन बार। लकड़ियाँ, पत्थर, पुराना कपड़ा, गत्ते के डिब्बे, एक रस्सी और दो-चार टायर, बस इतने में चालीस बच्चों की कक्षा एक शिक्षक की देखरेख में खेल सकती है। पहले एक बार पूरी जगह देख लीजिए, और टूटा काँच, नुकीली चीज़ें और ऐसी कोई भी चीज़ हटा दीजिए जिस पर चढ़ना जोखिम भरा हो।

फिर बीच में नहीं, किनारे पर ऐसी जगह बैठिए जहाँ से ज़्यादातर आँगन दिखे, और बस ध्यान से देखिए। किनारे बैठना बच्चों से चुपचाप कहता है कि उनके अपने समय के मामले में आप उन पर भरोसा करते हैं। हर दिन दो-तीन बच्चे चुनिए और कुछ मिनट एक-एक पर नज़र टिकाइए। देखिए कि वे क्या उठाते हैं, किसके साथ खेलते हैं, और चढ़ते हैं, उकड़ूँ बैठते हैं, संतुलन साधते हैं, इंतज़ार करते हैं या आगे बढ़कर अगुवाई करते हैं। दो हफ़्ते में पूरी कक्षा आपकी नज़र से गुज़र चुकी होगी। हर बच्चे के बारे में एक पंक्ति लिखिए, पर खेल के बाद, खेल के दौरान नहीं, ताकि किसी को यह न लगे कि उसकी जाँच चल रही है।

फिर यह सीखिए कि खेल में कब उतरना है। कोई बच्चा आपको पत्ता थमाकर कहे कि यह चाय है, तो यह न्योता है। चाय पी लीजिए, खेल के हिसाब से कुछ कह दीजिए, और खेल वापस बच्चों के हाथ में सौंप दीजिए। उस चाय को नाप-तौल का पाठ मत बनाइए। बिना बुलाए तभी जाइए जब किसी को चोट लगने वाली हो, जब कोई धींगामुश्ती वाला खेल किसी एक बच्चे के लिए मज़ा न रहकर तकलीफ़ बन जाए, या जब एक ही बच्चे को रोज़-रोज़ खेल से बाहर रखा जा रहा हो। उतना ही कीजिए जितने से बात बन जाए, और फिर लौट आइए। किसी बच्चे को हाथ पकड़कर खेल में मत खींचिए, और झगड़ा निपटाने के लिए किसी को ज़बरदस्ती गले मत मिलवाइए।

आख़िर में, खेल ख़त्म होने पर दो मिनट दीजिए, ताकि जो बच्चा चाहे, वह बता सके या दिखा सके कि उसने क्या बनाया।

किन बातों पर नज़र रखें

जब खुला खेल ठीक चल रहा होता है, तो शरीर आगे को झुके होते हैं, बच्चे अपने नियम ख़ुद गढ़ते हैं और उन पर बहस करते हैं, कोई एक हरकत तब तक दोहराई जाती है जब तक सध न जाए, और घंटी बजती है तो वे चौंक उठते हैं। कक्षा में लौटते हैं तो चेहरे तमतमाए होते हैं, पर मन ठहरा हुआ होता है। जब बात नहीं बन रही होती, तो बच्चे इधर-उधर भटकते रहते हैं और बार-बार आपकी ओर इजाज़त के लिए ताकते हैं, या वही खेल किसी न किसी के चोट खाने पर ख़त्म होता है।

दीवार से सटे उस लड़के को शुरू में किसी बचाव की ज़रूरत नहीं। देखना भी खेल में शामिल होने का एक तरीक़ा है, और बहुत से बच्चे खेल में उतरने से पहले देर तक देखते रहते हैं। उसके पास एक रस्सी या लकड़ियों और पत्थरों का ढेर रखकर चुपचाप हट जाइए। अगर कोई बच्चा कई हफ़्तों तक लगभग रोज़ अकेला रहे, तो माता-पिता से नरमी से बात कीजिए। अगर साथ में उसके हाथ-पैर का तालमेल असामान्य रूप से कमज़ोर लगे, या बोलने में देरी के साथ उसमें कल्पना वाला खेल (pretend play) बहुत कम दिखे, तो किसी बाल रोग विशेषज्ञ या बाल विकास विशेषज्ञ से मिलने का सुझाव दीजिए।

यह क्यों काम करता है

अमेरिकन एकेडमी ऑफ़ पीडियाट्रिक्स खेल को ऐसी गतिविधि मानती है जो बच्चे की अपनी भीतरी चाह से उपजती है, जिसमें वह पूरे मन से जुटा होता है, और जिसका अंत किसी खोज की ख़ुशी में होता है। उसकी चेतावनी है कि साफ़-साफ़ दिए गए निर्देश बच्चे की रचनात्मकता को बाँध सकते हैं। एलिज़ाबेथ बोनाविट्ज़ और उनके साथियों ने पाया कि जब किसी बड़े ने प्री-स्कूल उम्र के बच्चों को जान-बूझकर एक नए खिलौने का एक काम सिखाया, तो बच्चे ज़्यादातर उसी एक काम को आज़माते रहे, और खिलौना और क्या-क्या कर सकता है, यह खोज पाने की संभावना घट गई। नेक इरादे से दिया गया पाठ बच्चे की तलाश का दायरा छोटा कर गया।

इसका मतलब यह नहीं कि शिक्षक ग़ायब हो जाए। केली स्कीन (Kayleigh Skene) और उनके साथियों ने 39 अध्ययनों की समीक्षा की। उन्होंने पाया कि निर्देशित खेल (guided play), जिसमें बच्चे के पास कुछ चुनाव बना रहता है और बड़ा इशारों और सवालों से उसे आगे बढ़ाता है, शुरुआती गणित, आकृतियों की पहचान और एक काम से दूसरे काम पर ध्यान बदलने में सीधे पढ़ाने से बेहतर रहा। पर निर्देशित खेल और खुला खेल दो अलग चीज़ें हैं। बच्चों के खेल के साथ काम करने वाले (playworkers) गॉर्डन स्टरॉक और पेरी एल्स ने उस पल को एक नाम दिया, जब बड़े की अपनी ज़रूरत, यानी बचाने की, सिखाने की या क़ाबू रखने की, बच्चे के खेल पर हावी हो जाती है। उन्होंने इसे खेल में बड़ों की मिलावट (adulteration) कहा।

वायगोत्स्की ने लिखा था कि खेल में बच्चा मानो अपने कद से एक सिर ऊँचा हो जाता है, और ऐसे नियम निभाता है जो किसी बड़े ने उस पर नहीं थोपे। इसीलिए खेल शरीर का अपना पाठ्यक्रम है, और इसीलिए बच्चे का ध्यान वहाँ सबसे अच्छा पनपता है जहाँ उसने ख़ुद चुना हो कि किस पर ध्यान देना है। अगर हम बच्चों के खेल को उतने ही ध्यान से देखें जितने ध्यान से उनकी कॉपियाँ पढ़ते हैं, तो उनके बारे में ऐसा क्या जान पाएँगे जो कॉपियाँ कभी नहीं बतातीं?

इसकी जड़ें: R43 खेल: शरीर का अपना पाठ्यक्रम; R36 वायगोत्स्की: औज़ार, संकेत और शरीरों के बीच सीखना; R12 ध्यान शरीर की क्रिया है, मन की ज़ोर-आज़माइश नहीं; R18 श्रद्धा: सीखने की शर्त के रूप में भरोसा।

खेल के समय में अगला: P52 पुराने खेल, गहरी सीख: स्टापू, पकड़म-पकड़ाई और रस्सी कूद।

टिप्पणियाँ

  1. Yogman, M., Garner, A., Hutchinson, J., Hirsh-Pasek, K., Golinkoff, R. M., AAP Committee on Psychosocial Aspects of Child and Family Health, and AAP Council on Communications and Media (2018). The power of play: A pediatric role in enhancing development in young children. Pediatrics, 142(3), e20182058. https://doi.org/10.1542/peds.2018-2058
  2. Bonawitz, E., Shafto, P., Gweon, H., Goodman, N. D., Spelke, E., and Schulz, L. (2011). The double-edged sword of pedagogy: Instruction limits spontaneous exploration and discovery. Cognition, 120(3), 322–330. https://dspace.mit.edu/handle/1721.1/60992
  3. Skene, K., O’Farrelly, C. M., Byrne, E. M., Kirby, N., Stevens, E. C., and Ramchandani, P. G. (2022). Can guidance during play enhance children’s learning and development in educational contexts? A systematic review and meta-analysis. Child Development. https://doi.org/10.1111/cdev.13730
  4. Sturrock, G., and Else, P. (1998). The playground as therapeutic space: Playwork as healing (“The Colorado Paper”). Paper presented at the International Play Association conference, Colorado, USA. Described in King, P., and Sturrock, G. (Eds.) (2019). The Play Cycle: Theory, Research and Application. Routledge. https://www.taylorfrancis.com/books/9780429451485/chapters/10.4324/9780429451485-1
  5. Vygotsky, L. S. (1933/1966). Play and its role in the mental development of the child. Voprosy psikhologii, 1966, No. 6. Translated by Catherine Mulholland. Psychology and Marxism Internet Archive. https://www.marxists.org/archive/vygotsky/works/1933/play.htm

Ages 3–6Ages 6–8For teachers

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