ग्यारह बजे हैं। छोटी छुट्टी की घंटी अभी ठीक से थमी भी नहीं है। बरामदे में स्टील के टिफ़िन के ढक्कन खनक रहे हैं, और नीम के पेड़ के नीचे तीसरी कक्षा के दो लड़के धूल में गुत्थमगुत्था हैं। एक ने दूसरे के हाथ दबा रखे हैं, और दोनों हँसी से दोहरे हुए जा रहे हैं। तभी दोपहर की गर्मी को चीरती एक सीटी बजती है। “लड़ाई बंद करो! दोनों यहाँ आकर खड़े हो जाओ।” लड़के उठते हैं। कमीज़ें धूल से भूरी, साँसें फूली हुईं, चेहरे से मुस्कान धीरे-धीरे उतरती हुई। वे लड़ नहीं रहे थे। यह बात आँगन में सबको पता थी, सिवाय उस बड़े के।
दस मिनट बाद दोनों फिर अपनी बेंच पर हाथ बाँधे बैठे हैं। उस सुबह का असली पाठ तो पढ़ाया जा चुका है।
खेल आख़िर है क्या
खेल को परिभाषा में बाँधना मुश्किल है, पर पहचानना आसान। संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार समिति ने बाल अधिकार समझौते के अनुच्छेद 31 में दिए गए खेल के अधिकार को समझाते हुए कहा है कि खेल वह कोई भी व्यवहार या गतिविधि है जिसे बच्चे खुद शुरू करते हैं, खुद चलाते हैं और जिसकी शक्ल खुद तय करते हैं। इसमें कोई ज़बरदस्ती नहीं होती, और इसे बस खेल के लिए ही खेला जाता है। अमेरिकन एकेडमी ऑफ़ पीडियाट्रिक्स की 2018 की एक रिपोर्ट, जिसके मुख्य लेखक माइकल योगमैन हैं, इसमें जोड़ती है कि खेल भीतर से उपजता है, बच्चा उसमें पूरा डूबा रहता है, और उसका अंत किसी “ख़ुशी भरी खोज” में होता है। दोनों ही बातें केंद्र में खिलौने को नहीं, बच्चे को रखती हैं। आगे क्या होगा, यह बच्चा तय करता है।
खेल का बड़ा हिस्सा सीधे-सीधे शरीर का होता है। पीटर स्मिथ और एंथनी पेलेग्रिनी बताते हैं कि दौड़-भाग वाला खेल (exercise play), जैसे दौड़ना, चढ़ना, पकड़म-पकड़ाई या किसी तुकबंदी की लय पर रस्सी कूदना, दो-तीन साल की उम्र से नर्सरी तक बढ़ता जाता है, शुरुआती प्राथमिक कक्षाओं में सबसे ज़्यादा होता है और फिर घटने लगता है। हमारे उन दो लड़कों वाली कुश्ती-मस्ती (rough-and-tumble play) की अपनी एक भाषा है। स्मिथ और जेनिफ़र सेंटजॉर्ज वे निशान गिनाते हैं जो इसे असली झगड़े से अलग करते हैं। चेहरे पर खेल वाला भाव और हँसी, हाथ हल्का रखना, बारी-बारी से ऊपर-नीचे होना, और खेल ख़त्म होने के बाद भी साथ बने रहना। स्मिथ और पेलेग्रिनी के अनुसार प्राथमिक कक्षाओं में कुश्ती-मस्ती के सौ मौक़ों में से लगभग एक ही असली झगड़े में बदलता है। फिर भी शिक्षक अक्सर इसे रोक देते हैं, इस आम धारणा के चलते कि कुश्ती-मस्ती बच्चों को झगड़ालू बनाती है।
यह सोच कहाँ से आती है
1933 के एक लेख में ल्येव वायगोत्स्की ने उस बच्चे की बात की है जो छड़ी को घोड़ा बनाकर दौड़ता है। उनके अनुसार छड़ी एक “धुरी” (pivot) बन जाती है, जिसके सहारे अर्थ चीज़ से अलग होने लगता है। खेल में बच्चा अपने रोज़ के आप से आगे निकल जाता है, मानो वह “अपने से एक सिर ऊँचा” हो गया हो। और खेल नियमों से भरा होता है। माँ या दुकानदार बनकर खेलती बच्ची को वैसे ही पेश आना पड़ता है जैसे माँ या दुकानदार पेश आते हैं। इसीलिए शुरुआती खेल का इतना बड़ा हिस्सा पूरे शरीर से की गई नक़ल है। वायगोत्स्की ने देखा कि ऐसे नियम निभाते हुए बच्चे उस पल की अपनी इच्छा छोड़ देते हैं। यानी अपने आप पर क़ाबू रखना बच्चा किसी के समझाने से बहुत पहले खेल में साधने लगता है।
भारत की नीति भी, कम से कम काग़ज़ पर, यही मानती है। तीन से आठ साल के बच्चों के लिए 2022 में आई बुनियादी स्तर की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (National Curriculum Framework for the Foundational Stage) कहती है कि बच्चे “खेल के ज़रिए सबसे अच्छा सीखते हैं”, और इस उम्र में खेल और गतिविधि को सीखने का मुख्य रास्ता बताती है। यह उस व्यवस्था के लिए बड़ा बदलाव है जिसने खेल के मैदान को हमेशा वह जगह माना जहाँ पढ़ाई निपटने के बाद जाया जाता है।
शोध क्या कह सकता है और क्या नहीं
खेल के गुण गाने वाले बहुत हैं, इसलिए यहाँ ईमानदारी ज़रूरी है। एंजलीन लिलार्ड और उनके साथियों ने कल्पना वाले खेल (pretend play) पर दशकों के शोध को खँगाला। उन्होंने पाया कि उपलब्ध प्रमाण इस बड़े दावे को साबित नहीं करते कि बच्चे के विकास के लिए कल्पना वाला खेल कोई अनोखी, अनिवार्य चीज़ है। पीटर ग्रे अमेरिका में बच्चों के खुले खेल के घटने को किशोरों और बच्चों में बढ़ती बेचैनी और अवसाद से जोड़ते हैं, पर वे खुद साफ़ कहते हैं कि दो चीज़ों का साथ-साथ बदलना यह साबित नहीं करता कि एक, दूसरी की वजह है। ये चेतावनियाँ हैं। इनसे यह साबित नहीं होता कि ज़्यादा खेलने से नंबर बढ़ जाएँगे।
बच्चा क्या है, यह सवाल
यहीं मेरा रास्ता खेल के पक्ष में दिए जाने वाले आम तर्क से अलग हो जाता है। ज़्यादातर तर्क खेल को किसी और चीज़ का साधन मानते हैं। खेल से सोचने-समझने और ख़ुद को साधने की क्षमताएँ (executive function) बढ़ती हैं, तो उसे टाइमटेबल में डाल दो। हिलने-डुलने से ध्यान टिकता है, तो बीच में एक ब्रेक दे दो। कल को अगर ये फ़ायदे उम्मीद से कम निकले, तो खेल का पीरियड भी गया। यह कच्ची नींव है।
असली बात सीधी है। खेल वह तरीका है जिससे एक छोटा शरीर जानता है कि दुनिया क्या है और वह उसमें क्या-क्या कर सकता है। जब बच्ची किसी नीची मुंडेर पर संतुलन बनाती है, किसी दोस्त के पीछे भागती है या छड़ी को घोड़ा बना लेती है, तो वह सीखने की तैयारी नहीं कर रही होती। वह अपने पूरे शरीर से सीख रही होती है, अपनी शर्तों पर। यह उसके शरीर का अपना पाठ्यक्रम है, और इसे वह खुद लिख रही है। स्कूल इसे भी एक वर्कशीट बना सकते हैं। शिक्षक के इशारे पर चलता, घड़ी से बँधा “ढाँचे वाला खेल”, जिसमें बच्चा फिर से चुपचाप बैठा अगले निर्देश की राह देख रहा हो। रूपरेखा खुद खुले खेल को निर्देशित और ढाँचे वाले खेल के साथ गिनाती है। अब सोचिए, ठसाठस भरी कक्षा और पूरा करने को पड़े सिलेबस के बीच इनमें से कौन-सा बचेगा?
फिर से नीम के पेड़ वाले उस आँगन में चलिए। दो लड़के एक-दूसरे का चेहरा पढ़ रहे थे, तौल रहे थे कि कितना ज़ोर लगाना है, बारी-बारी से दूसरे को जीतने दे रहे थे, और लगातार हँस रहे थे। उन दस शोर भरे मिनटों में वे अपनी मांसपेशियों से भरोसा, संयम और बराबरी का अभ्यास कर रहे थे। फिर सीटी बज गई। उस सीटी ने उन्हें अपने ही शरीर के बारे में क्या सिखाया, और इस बारे में कि सीखना किसे माना जाएगा, यह कौन तय करता है?
इसे अमल में लाएँ: P51 खुला खेल: बच्चे खेलें तो शिक्षक क्या करें · P53 कुश्ती-मस्ती: कब बीच में पड़ें, कब नहीं · P54 खुली चीज़ें: डंडियाँ, पत्थर और खुला खेल
आगे पढ़ें: R54 ग़ायब होता खेल का मैदान · R42 नक़ल: दूसरों जैसा बनकर सीखते बच्चे
संदर्भ
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