सुबह के पोंछे के बाद फ़्लैट का पत्थर का फ़र्श अब भी ठंडा है। नौ महीने की एक बच्ची घुटनों और हथेलियों के बल उस पर आगे बढ़ रही है। उसकी हथेलियाँ पत्थर पर थप-थप करती हैं, और वह दीवान के नीचे लुढ़क गए स्टील के गिलास की ओर जा रही है। रसोई में कुकर की सीटी बजती है। वह रुकती है, एड़ियों पर पीछे बैठती है, आवाज़ की ओर मुड़ती है और डगमगा जाती है। दरी पर कपड़े तह करती उसकी दादी हाथ नहीं बढ़ातीं। बच्ची ख़ुद को सँभालती है, फिर मुड़ती है और गिलास तक पहुँच जाती है। गिलास सीधा मुँह में जाता है।
उस कमरे में कोई इसे पाठ नहीं कहेगा। फिर भी शायद यह उन सबसे कठिन पाठों में से एक है जो कोई मनुष्य कभी पढ़ता है।
पड़ाव कोई एक दिन की घटना नहीं
पहले दो सालों को हम अक्सर एक सीढ़ी की तरह पढ़ते हैं। छह महीने में बैठना, नौ में घुटनों के बल चलना, साल भर में चलना, और फिर शब्दों के साथ असली सीखना शुरू। यह सूची उस बच्चे को पहचानने में मदद करती है जिसे सहारे की ज़रूरत है, पर यह कुछ छिपा भी लेती है। पड़ाव ऐसा लगता है जैसे किसी तारीख़ को कोई हुनर अचानक चालू हो गया। ध्यान से देखें तो हर पड़ाव अभ्यास का एक लंबा, बेतरतीब दौर है, जिसमें शरीर पता लगाता है कि वह क्या-क्या कर सकता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मोटर डेवलपमेंट स्टडी ने घाना, भारत, नॉर्वे, ओमान और अमेरिका के 816 स्वस्थ बच्चों को देखा। अपने-आप चलना लगभग आठ से अठारह महीने के बीच कभी भी शुरू हुआ, और सौ में लगभग चार बच्चे कभी घुटनों और हाथों के बल चले ही नहीं। शोधकर्ताओं ने इसे सामान्य भिन्नता कहा।
हज़ारों क़दम, दर्जनों बार गिरना
कैरन अडॉल्फ़ और उनके साथियों ने बारह से उन्नीस महीने के बच्चों को खुले खेल में फ़िल्माया। एक घंटे में औसतन 2,368 क़दम और 17 बार गिरना। छोटा बच्चा किसी एक सही हरकत का रियाज़ नहीं कर रहा। उसके सामने नया फ़र्श आता है, दहलीज़ आती है, किसी भाई-बहन का फैला हुआ पैर आता है, और हर चीज़ उसके शरीर को कुछ अलग करने का न्योता देती है।
अडॉल्फ़ ने एक और अजीब बात पाई। जो नौ महीने के बच्चे कई महीनों से बैठ रहे थे, वे बैठे-बैठे बड़ी सावधानी से तय करते थे कि किस खाई की ओर झुका जा सकता है और किसकी ओर नहीं। पर घुटनों के बल उन्हीं खाइयों पर, कई बच्चे सीधे किनारे से आगे बढ़ गए। बैठकर संतुलन के बारे में जो उन्होंने जाना था, वह घुटनों के बल चलने में साथ नहीं आया। हर मुद्रा नए सिरे से सीखनी पड़ी, जैसे बच्चा अपने शरीर का नक्शा और उसकी पहुँच फिर से बना रहा हो। संतुलन कोई गुण नहीं जो बच्चे के पास हो। उसे सीधे खड़े होने के हर नए ढंग में फिर से साधना पड़ता है।
एस्तेर थेलेन ने दिखाया कि इसमें साधारण, भौतिक शरीर का कितना हाथ है। नवजात को सीधा पकड़ें तो वह क़दम उठाने जैसी हरकत करता है, जो कुछ महीनों में ग़ायब हो जाती है। पुरानी व्याख्या यह थी कि दिमाग़ एक आदिम प्रतिवर्त को बंद कर देता है। थेलेन ने देखा कि सबसे गोल-मटोल बच्चों ने सबसे पहले क़दम उठाना छोड़ा। पैरों पर छोटे वज़न बाँधने से क़दम कम हो गए, और छाती तक पानी में रखने से लौट आए। क़दम दिमाग़ से ग़ायब नहीं हुए थे। पैर भारी हो गए थे।
चलना-फिरना बदल देता है कि बच्चा क्या जानता है
जोसेफ़ कैम्पोस और उनके साथियों ने बरसों के अध्ययन एक सुंदर शीर्षक के नीचे इकट्ठा किए, “Travel broadens the mind”, यानी सफ़र मन को बड़ा करता है। उनके अनुसार ऊँचाई से सावधानी केवल उम्र से नहीं आती, बल्कि अक्सर कुछ हफ़्तों तक घुटनों के बल चलने के बाद आती है। जो बच्ची माँ से दूर जा सकती है, वह माँ का चेहरा पढ़ने लगती है और देखने लगती है कि बड़े कहाँ देख रहे हैं और कहाँ इशारा कर रहे हैं। बीजिंग में जो बच्चे दिन भर फ़र्श पर रहते थे, वे बड़ों की नज़र का पीछा उन हमउम्र बच्चों से बेहतर करते थे जिन्हें बिस्तर पर रखा जाता था।
बाद में एरिक वॉल और जोसेफ़ कैम्पोस ने पाया कि शब्द समझने और बोलने में उछाल चलना शुरू होने के बाद आया, सिर्फ़ उम्र बढ़ने से नहीं। चलता हुआ बच्चा लोगों से अलग तरह से मिलता है, और लोग भी उससे अलग तरह से मिलते हैं। यह अपने सबसे सीधे रूप में संवेदी-गतिक सीखना है।
सोचने से पहले का अभ्यास नहीं
आम दलील यह है कि बच्चों को घुटनों के बल चलने दो, क्योंकि इससे दिमाग़ आगे की पढ़ाई के लिए तैयार होता है। यह सच है, पर बहुत छोटा सच। यह फ़र्श को एक जिम मान लेता है जहाँ शरीर मन के लिए वॉर्म-अप करता है। घुटनों के बल चलना, डगमगाना और गिरना ख़ुद सोचना है। ठंडे फ़र्श पर वह बच्ची अपनी हथेलियों, अपने घुटनों और अपने अंगों की स्थिति के एहसास से सोच रही है। यही सन्निहित संज्ञान का दावा है। यह बताता है कि बच्चा क्या है, उसे तेज़ बनाने की कोई तकनीक नहीं।
बड़े भी इसे आकार देते हैं। लाना करासिक और उनके साथियों ने छह देशों के पाँच महीने के बच्चों की तुलना की। कैमरून और केन्या में ज़्यादातर बच्चे पल भर के लिए अपने-आप बैठ लेते थे, और उनका बहुत-सा बैठना फ़र्श या बड़ों के फ़र्नीचर पर होता था, जहाँ उन्हें ख़ुद संतुलन साधना पड़ता था। अमेरिका और इटली में बच्चे ज़्यादातर गोद में रहते थे या सीटों में बँधे रहते थे, और बहुत कम अपने-आप बैठ पाते थे। भारत उस अध्ययन में शामिल नहीं था, पर सवाल हमारे घरों तक आता है। बाउंसर, वॉकर या बँधी हुई सीट में बच्चा ऐसा क्या सीखता है जो फ़र्श पर नहीं सीख सकता, और वह क्या खो देता है?
उस दादी को फिर से याद कीजिए जिन्होंने हाथ नहीं बढ़ाया। उनके ठहराव ने बच्ची को ऐसी डगमगाहट दी जिससे वह ख़ुद उबर सकती थी। कुछ साल बाद यही बच्ची कक्षा में जाएगी और उससे कहा जाएगा कि चुपचाप बैठो। जब हम उससे यह माँगते हैं, तो उसकी पहली और सबसे गहरी शिक्षा का कौन-सा हिस्सा हम उसके शरीर से एक तरफ़ रख देने को कह रहे होते हैं?
इसे व्यवहार में लाएँ: P29 · संतुलन के खेल और ध्यान देता बच्चा; P11 · फ़र्श पर और कुर्सी पर बैठना: हर एक ध्यान पर क्या असर डालता है; P54 · खुली चीज़ें: डंडियाँ, पत्थर और खुला खेल
आगे पढ़ें: R39 · हाथ: मुट्ठी से पेंसिल पकड़ने तक; R7 · संवेदी-गतिक सीखना: हम चलकर देखना सीखते हैं
संदर्भ
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