गत्ते के एक छोटे हरे टुकड़े पर बारीक रेगमाल से कटा एक अक्षर चिपका है। चार साल की एक बच्ची सूती दरी पर पालथी मारे बैठी है और उसकी दो उँगलियाँ अक्षर के खुरदुरे घुमाव पर टिकी हैं। ऊपर पंखा धीरे-धीरे घूम रहा है। आँगन से नारियल की सींकों वाली झाड़ू की सर्र-सर्र आ रही है। बच्ची अक्षर पर धीरे से एक बार उँगली फिराती है, ठीक वैसे जैसे दीदी ने दिखाया था, और होंठों में उसकी आवाज़ बुदबुदाती है। फिर दोबारा फिराती है। किसी ने कहा नहीं है। कोई देख भी नहीं रहा।
हमारे यहाँ अनगिनत प्ले-स्कूलों के गेट पर “मॉन्टेसरी” लिखा होता है, अक्सर इस वादे के साथ कि बच्चा जल्दी पढ़ना सीख जाएगा। पर इस नाम के पीछे जो स्त्री थी, उसकी तलाश इससे कहीं बड़ी थी। वह कई बातों में इन विज्ञापनों से ज़्यादा सही थी, और एक ज़रूरी बात में चूक भी गई।
बच्चों के बीच एक डॉक्टर
मारिया मॉन्टेसरी पहले डॉक्टर बनीं, शिक्षिका बाद में। 1890 के दशक में वे रोम विश्वविद्यालय के मनोरोग क्लिनिक में सहायक डॉक्टर थीं। वहीं उनका ध्यान उन बच्चों पर गया जिन्हें उस ज़माने के आश्रम “कमज़ोर” कहकर अलग रख देते थे। उन्होंने फ़्रांस के दो डॉक्टरों, ज़ाँ इटार और एदुआर सेगाँ, को पढ़ा। इन दोनों ने ऐसे बच्चों को इंद्रियों के सहारे और हिल-डुलकर सीखने के रास्ते पढ़ाने की कोशिश की थी। इसी तरह पढ़े उनके कुछ विद्यार्थी आम बच्चों के साथ सरकारी स्कूल की परीक्षा में बैठे और पास भी हो गए। जिन बच्चों को व्यवस्था ने छोड़ दिया था, उनके साथ ऐसा हो सकता है, तो यही तरीके हर बच्चे के लिए क्या कर सकते हैं?
मौक़ा 6 जनवरी 1907 को मिला, रोम के सान लोरेंज़ो नाम के एक उजड़े-से मोहल्ले में। वहाँ मज़दूर परिवारों के कोई पचास छोटे बच्चे दिन भर अकेले रह जाते थे, और उनके लिए एक कमरा निकाला गया। यही कमरा पहला “कासा देई बाम्बिनी” यानी बालघर बना।
शरीर में उन्होंने क्या देखा
मॉन्टेसरी ने अपने समय के आम स्कूल को देखा तो उन्हें वहाँ एक क़ैद शरीर दिखा। अपनी किताब The Montessori Method में उन्होंने लिखा कि बच्चे अपनी-अपनी डेस्क से ऐसे बँधे रहते हैं जैसे पिन से टँकी तितलियाँ। उन्होंने इसका ठीक उलटा रचा। उनकी कक्षा में बच्चा अपना काम ख़ुद चुनता है, घूमता-फिरता है और फ़र्श पोंछने जैसे असली काम करता है। इन कामों को उन्होंने रोज़मर्रा की ज़िंदगी के अभ्यास (exercises of practical life) कहा।
लिखना सिखाने का उनका तरीका गहरी समझ से निकला था। उन्होंने हाथ की हरकत को अक्षर के अर्थ से अलग किया और हाथ को पहले तैयार किया। बच्चा रेगमाल के अक्षरों को छूता है और उँगलियों से उनकी शक्ल पर चलता है, क्योंकि मॉन्टेसरी के मुताबिक़ छोटे बच्चे में मांसपेशियों की याद (muscular memory) सबसे पक्की होती है। उन्होंने देखा कि हाथ तैयार हो जाए तो लिखना धीरे-धीरे नहीं आता, एकदम फूट पड़ता है। जिसने भी मोमी रंग भींचती मुट्ठी को धीरे-धीरे पेंसिल की ठीक पकड़ में बदलते देखा है, वह जानता है कि मॉन्टेसरी किस चीज़ को देख रही थीं।
भारत ने भी उन्हें गढ़ा। थियोसॉफ़िकल सोसाइटी के अध्यक्ष जॉर्ज अरुंडेल और रुक्मिणी देवी के बुलावे पर वे 1939 में आईं, मद्रास के अड्यार में भारत का पहला मॉन्टेसरी प्रशिक्षण कोर्स चलाया, और युद्ध के बरसों में 1946 तक यहीं रहीं। 1947 से 1949 तक वे फिर आईं। इन बरसों में तीन साल से छोटे बच्चों पर उनके अध्ययन से The Absorbent Mind (1949) निकली, और इसी किताब में वह वाक्य है जिससे इस लेख का शीर्षक बना। “हाथ मनुष्य की बुद्धि के औज़ार हैं।”
आज के प्रमाण हौसला बढ़ाते हैं, पर उनकी हदें भी हैं। एंजेलीन लिलार्ड और उनके साथियों ने अमेरिका के हार्टफ़र्ड शहर में उन 141 बच्चों को तीन साल तक परखा जिनके नाम दो सरकारी मॉन्टेसरी प्री-स्कूलों की लॉटरी में डाले गए थे। जिन्हें दाख़िला मिला, वे पढ़ाई में और दूसरों के मन को समझने में तेज़ी से आगे बढ़े, और उनमें अमीर-ग़रीब घरों के बच्चों का फ़ासला भी कम रहा। पर शोधकर्ता ख़ुद मानते हैं कि यह एक शहर के दो स्कूलों की बात है, और कुछ बच्चों के बीच में छूट जाने से नतीजे थोड़े झुक सकते थे।
औज़ार और उसे चलाने वाला
तो यह शृंखला मॉन्टेसरी से कहाँ अलग राह पकड़ती है? दो जगह।
पहली बात खेल की है। “मान लो” वाले खेल (pretend play) से मॉन्टेसरी को ख़ास लगाव नहीं था। लिलार्ड, जो उनकी प्रशंसक हैं, लिखती हैं कि मॉन्टेसरी शिक्षा में ऐसे खेल की कोई जगह नहीं है। लेकिन जो बच्चा डंडे पर सवार होकर उसे घोड़ा बना लेता है और पूरे आँगन में दौड़ता है, वह समय बरबाद नहीं कर रहा। उसका पूरा शरीर “मान लो ऐसा हो” को आज़मा रहा है, और इस तरह का खेल शरीर के सीखने के सबसे पुराने रास्तों में से एक है।
दूसरी बात उसी वाक्य की है। औज़ार वह चीज़ है जिसे कोई उठाता है और काम होने पर रख देता है, जैसे बढ़ई अपनी छेनी। हाथ को बुद्धि का औज़ार कहने का मतलब है बुद्धि को कहीं और, ऊपर बिठा देना, जहाँ से वह दूर बैठे हाथ से काम लेती है। मॉन्टेसरी ने अपनी कक्षाओं में बच्चे के शरीर को आज़ाद किया, पर उनकी भाषा में पुराना क्रम बना रहा, यानी मन ऊपर और शरीर नीचे। शरीर से जुड़े संज्ञान (embodied cognition) पर हुआ काम उलटी दिशा दिखाता है। सोचना हाथ में भी होता है। गांधी की नई तालीम ने भी हाथ को पढ़ाई के बीच में रखा था, और उसके सामने भी यही सवाल खड़ा है। स्कूल में हलचल के पक्ष में दी जाने वाली आम दलील के सामने भी, जो शरीर को बेहतर नंबर लाने का साधन भर मानती है। शरीर जल्दी सीखने का कोई नुस्ख़ा नहीं है। सीखने वाला ख़ुद शरीर है।
दरी पर बैठी उस बच्ची के पास लौटिए। उँगलियाँ खुरदुरे घुमाव पर हैं, होंठ एक आवाज़ गढ़ रहे हैं। मॉन्टेसरी ने उसे अपने ज़माने के लगभग हर किसी से ज़्यादा साफ़ देखा था। उन्होंने देखा कि बच्ची हिलना चाहती है, छूना चाहती है, असली काम करना चाहती है, और बिना कहे एकाग्र होना जानती है। पर जब वह अक्षर आख़िरकार उसके भीतर बैठ जाता है, तो उसे सीखा किसने? किसी मन ने, जिसने कुछ देर के लिए उसकी उँगलियाँ उधार ले ली थीं, या ख़ुद उस बच्ची ने?
इसे कक्षा में उतारें: P16 अक्षरों से पहले मिट्टी: हाथ को लिखने के लिए तैयार करना · P18 हवा, रेत, फिर काग़ज़: एक अक्षर लिखने के तीन पड़ाव · P47 धोना और समेटना: देखभाल भी पाठ्यक्रम है
आगे पढ़ें: R39 हाथ: मुट्ठी की पकड़ से पेंसिल की पकड़ तक · R32 स्टाइनर और वाल्डॉर्फ़: लय, हलचल और कल्पना
टिप्पणियाँ (Notes)
- Montessori, M. (1912). The Montessori Method: Scientific Pedagogy as Applied to Child Education in “The Children’s Houses”. Trans. A. E. George. New York: Frederick A. Stokes. Chapters I, II and XVII. Project Gutenberg edition: https://www.gutenberg.org/ebooks/39863
- Montessori, M. (1949). The Absorbent Mind. The line “The hands are the instruments of man’s intelligence” is cited from p. 25 by the Association Montessori Internationale: https://montessori-ami.org/node/1819
- Association Montessori Internationale. “On this Day: First Casa dei Bambini.” https://montessori-ami.org/news/day-first-casa-dei-bambini
- Association Montessori Internationale Archives. “Montessori in India.” https://archives.montessori-ami.org/montessori-india
- Lillard, A. S., Heise, M. J., Richey, E. M., Tong, X., Hart, A., & Bray, P. M. (2017). Montessori preschool elevates and equalizes child outcomes: a longitudinal study. Frontiers in Psychology, 8, 1783. https://doi.org/10.3389/fpsyg.2017.01783
- Lillard, A. S. (2013). Playful learning and Montessori education. American Journal of Play, 5(2), 157–186.
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