जून है और बारिश इस बार देर से है। एक छोटे शहर के सरकारी स्कूल की दूसरी कक्षा में पंखा धीरे-धीरे घूम रहा है, पर हवा गरम और भारी है। नई मैडम हरे बोर्ड पर एक शब्द लिखती हैं और चॉक आगे बढ़ाती हैं। दूसरी पंक्ति में बैठी एक बच्ची को वह शब्द आता है। वह खड़ी होती है, बोर्ड की तरफ़ तीन कदम चलती है और रुक जाती है। उसके कंधे सिकुड़कर कानों तक चढ़ आए हैं और उँगलियाँ फ़्रॉक का किनारा मरोड़ रही हैं। पिछले साल वाले मास्टर जी मेज़ पर लकड़ी का रूलर रखते थे। नई मैडम को यह नहीं पता। बच्ची के शरीर को पता है।
उसके पढ़ने में कोई कमी नहीं है। उसके और चॉक पकड़े खड़ी मैडम के बीच अभी कुछ घटा नहीं है, और भारतीय परंपराओं में उस “कुछ” के लिए एक शब्द है।
श्रद्धा का मतलब क्या है
हम श्रद्धा को अक्सर आस्था या विश्वास समझ लेते हैं, पर यह आधी बात है। शब्दों का इतिहास खोजने वाले बताते हैं कि श्रद्धा और लैटिन का credo (“मैं विश्वास करता हूँ”) एक ही पुरानी जड़ से निकले हैं, जिसका अर्थ है “अपना दिल कहीं रख देना”। यानी श्रद्धा पहले दिमाग़ में रखी कोई राय नहीं है। श्रद्धा वह जगह है जहाँ आपने अपना दिल रख दिया है, और इसलिए आपका पूरा अस्तित्व उसी ओर झुका रहता है।
भगवद्गीता इसे जानने की शर्त मानती है। चौथे अध्याय में कहा गया है, “श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्”, यानी जिसमें श्रद्धा है उसे ज्ञान मिलता है। सत्रहवें अध्याय में वह कहती है कि मनुष्य श्रद्धामय है, जिसकी जैसी श्रद्धा, वह वैसा ही। भरोसा कोई चीज़ नहीं जो सीखने वाले के पास होती है। वह सीखने वाले की बनावट का हिस्सा है।
आज्ञापालन नहीं, किसी की ओर बढ़ना
हमारे स्कूलों ने अक्सर श्रद्धा का मतलब चुपचाप हुक्म मानना समझा है। पर पुराने ग्रंथ ऐसा पढ़ने नहीं देते। कठोपनिषद में बालक नचिकेता देखता है कि उसके पिता ऐसी गायें दान कर रहे हैं जो आख़िरी बार पानी पी चुकी हैं और आख़िरी बार दूध दे चुकी हैं। ग्रंथ कहता है कि तब उस बालक में श्रद्धा प्रवेश कर गई। और श्रद्धा उससे करवाती क्या है? वह उससे अपने पिता से सवाल करवाती है।
पालि ग्रंथों का चंकी सुत्त बताता है कि कोई जिज्ञासु किसी गुरु से कैसे सीखने आता है। पहले वह गुरु को परखता है और देखता है कि यह व्यक्ति लोभ, द्वेष और मोह से मुक्त है। उसके बाद ही वह उस पर सद्धा (भरोसा) रखता है। भरोसा होने पर वह उसके पास जाता है, उसके निकट बैठने लगता है। निकट आकर वह कान लगाकर सुनता है। फिर सुनता है, याद रखता है, तौलता है, मेहनत करता है, और आख़िर में सत्य को अपने शरीर से जान लेता है। शुरुआत पर ध्यान दीजिए। भरोसा कमरे के पार चलकर जाना है, किसी के पास जाकर बैठना है, किसी आवाज़ की तरफ़ कान मोड़ना है। वह विचार बनने से पहले एक हलचल है, और यही होना भी चाहिए अगर सोचना सिर्फ़ दिमाग़ के भीतर नहीं होता।
भरोसा सीखते हुए शरीर के साथ क्या करता है
सेलेस्ट किड और उनके साथियों ने छोटे बच्चों के साथ मशहूर “मार्शमैलो टेस्ट” किया, पर एक बदलाव के साथ। टेस्ट से पहले एक बड़े ने बच्चे से दो छोटे वादे किए और या तो उन्हें निभाया या तोड़ दिया। जिन बच्चों ने वादा निभाने वाले बड़े को देखा था, उन्होंने मिठाई खाने से पहले लगभग चार गुना ज़्यादा देर इंतज़ार किया। जो चीज़ आत्म-संयम जैसी दिखती थी, वह असल में एक समझदार अंदाज़ा था कि बड़े अपनी बात के पक्के हैं या नहीं।
जेम्स कोन और उनके साथियों ने कुछ विवाहित महिलाओं को दिमाग़ की स्कैनिंग मशीन में रखा और उन्हें हल्के बिजली के झटके का डर दिखाया। जब उन्होंने अपने पति का हाथ पकड़ा, तो दिमाग़ में ख़तरे वाली प्रतिक्रिया बड़े हिस्से में शांत हो गई। किसी अनजान का हाथ कम मदद कर पाया, और जितना अच्छा दांपत्य, उतना गहरा असर। ये बड़े लोग थे, बच्चे नहीं, पर सबक़ दूर तक जाता है। भरोसे का हाथ शरीर के भीतर डर का काम बदल देता है। स्कूलों पर हुए 99 अध्ययनों की एक बड़ी समीक्षा में डेबोरा रूर्डा और उनके साथियों ने पाया कि शिक्षक और विद्यार्थी के बीच गर्मजोशी भरा रिश्ता पढ़ाई में ज़्यादा जुड़ाव से और कुछ कम हद तक बेहतर नतीजों से जुड़ा है।
यह शृंखला कहाँ अलग राह लेती है
शिक्षा में भरोसे की बात अक्सर एक औज़ार की तरह की जाती है। बच्चों से अपनापन बनाइए तो वे बेहतर व्यवहार करेंगे और ज़्यादा अंक लाएँगे। इसमें भरोसा पढ़ाई की मशीन में डाला जाने वाला तेल भर रह जाता है। श्रद्धा इससे गहरी बात कहती है। डरी हुई बच्ची कोई ऐसी विद्यार्थी नहीं है जो संयोग से घबराई हुई है। उसका शरीर अपनी रक्षा में लगा है, पेट में गाँठ और तेज़ धड़कते दिल के संकेतों में उलझा है, और उसका ध्यान शब्द पर नहीं, रूलर पर अटका है। भरोसा वह ज़मीन है जिस पर सीखता हुआ शरीर खड़ा होता है, और जो ज़मीन है ही नहीं, उस पर कोई तरीक़ा नहीं बिछाया जा सकता।
ग्रंथ यह भी साफ़ बताते हैं कि भरोसा कमाने की ज़िम्मेदारी किसकी है। सुत्त में सुनने वाला पहले गुरु को परखता है। नचिकेता को इतना भरोसा है कि वह बहस कर सके। श्रद्धा उसे दी जाती है जो उसे कमाता है। उसे सज़ा से या कक्षा में आगे रखी कुर्सी के रुतबे से वसूला नहीं जा सकता। तो सवाल हमारी ओर लौट आता है। हमारी कितनी कक्षाएँ बच्चों से श्रद्धा माँगती हैं, बिना उसे कभी कमाए?
दूसरी कक्षा के उस कमरे में बच्ची अब भी बोर्ड से एक मीटर दूर खड़ी है। वह सीखने से इनकार नहीं कर रही। वह अपने कंधों और पैरों से तय कर रही है कि यह मैडम सुरक्षित हैं या नहीं। उन आख़िरी तीन कदमों के मुमकिन होने से पहले मैडम को अपनी आवाज़, अपने हाथों और अपने धीरज से क्या करना होगा?
इसे कक्षा में उतारें: P4 हर बच्चे का नाम लेकर, आँखों से स्वागत · P1 दहलीज़: बच्चे कक्षा में कैसे प्रवेश करते हैं · P25 रुककर इंतज़ार: बच्चों को बोलने की जगह देना
आगे पढ़ें: R44 स्पर्श, सुरक्षा और सीखने की तैयारी · R28 कृष्णमूर्ति: डर, ध्यान और आज़ादी
संदर्भ
- Bhagavad Gītā 4.39, Sanskrit text and English translation, Shlokam. https://shlokam.org/gita/gita-4-39.htm
- Bhagavad Gītā 17.3, Sanskrit text and English translation, Holy Bhagavad Gita (Swami Mukundananda). https://www.holy-bhagavad-gita.org/chapter/17/verse/3/
- “Credo”, Online Etymology Dictionary. https://www.etymonline.com/word/credo
- Kaṭha Upaniṣad 1.1.1–3, in The Upanishads, translated by Swami Paramananda. https://www.hinduwebsite.com/sacredscripts/hinduism/parama/katha.asp
- Caṅkī Sutta (Majjhima Nikāya 95), translated by Ṭhānissaro Bhikkhu, dhammatalks.org. https://dhammatalks.org/suttas/MN/MN95.html
- Kidd, C., Palmeri, H., & Aslin, R. N. (2013). Rational snacking: Young children’s decision-making on the marshmallow task is moderated by beliefs about environmental reliability. Cognition, 126(1), 109–114. https://pmc.ncbi.nlm.nih.gov/articles/PMC3730121/
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