Roots · What schooling does to the body

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गायब होता खेल का मैदान

अक्टूबर की चमकीली सुबह है, साढ़े ग्यारह बजे हैं, और स्कूल के पीछे का मैदान सूना पड़ा है। धूप में सूखी मिट्टी पर पपड़ी जम गई है। नीम की छितरी छाया में दो ईंटें रखी हैं, जो गोलपोस्ट का काम करती हैं। जहाँ बच्चों को दौड़ना चाहिए था, वहाँ एक कौआ टहल रहा है। अंदर, सलाखों वाली खिड़की के पीछे, छठी कक्षा यूनिट टेस्ट की तैयारी में जुटी है। खेल का पीरियड इसी के लिए ले लिया गया है। कमरे में चॉक और गरम टिफ़िन की महक है, और तीसरी बेंच के नीचे एक लड़के का पैर लगातार फ़र्श पर थपथपा रहा है, जैसे उसका कोई हिस्सा पहले ही बाहर निकल चुका हो।

किसी ने सोच-समझकर उससे मैदान नहीं छीना। मैदान तो वहीं है। इसीलिए उसका गायब होना आसानी से दिखाई नहीं देता।

काग़ज़ पर मौजूद मैदान

शिक्षा का अधिकार कानून (RTE Act) कहता है कि हर स्कूल भवन के साथ खेल का मैदान होना चाहिए। पर मैदान कितना बड़ा हो और बच्चे उसमें कितनी बार खेलें, इस पर कानून चुप है। 2024 में केरल हाईकोर्ट ने कहा कि मैदान स्कूल का अभिन्न हिस्सा है, कानून की इसी चुप्पी की ओर ध्यान दिलाया, और राज्य से मैदान का न्यूनतम आकार तय करने को कहा। UDISE+ 2024–25 के अनुसार लगभग 14.7 लाख स्कूलों में से करीब 12.2 लाख में खेल का मैदान दर्ज है, यानी पाँच में से चार से कुछ ज़्यादा। फिर भी लगभग ढाई लाख स्कूलों के पास मैदान है ही नहीं।

लेकिन रजिस्टर ज़मीन गिनता है, घंटे नहीं। मैदान आँकड़ों में पूरा का पूरा मौजूद रह सकता है और बच्चे के दिन से फिर भी गायब हो सकता है। कभी वह मेहमानों की गाड़ियों की पार्किंग बन जाता है, कभी वार्षिकोत्सव का पंडाल, कभी “सुरक्षा के लिए” उस पर ताला लग जाता है, और कभी वह बस खिड़की से दिखने वाला नज़ारा रह जाता है, जब खेल का पीरियड गणित को उधार दे दिया जाता है। 2018 में सीबीएसई ने अपने स्कूलों से कहा कि नौवीं से बारहवीं तक रोज़ एक पीरियड स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा का रखा जाए। ज़रा देखिए कि हल क्या निकला। शरीर को समय-सारणी में एक पीरियड मिल गया, और पीरियड ही वह चीज़ है जो सबसे आसानी से किसी और को दे दी जाती है।

खोए हुए घंटों पर शोध क्या कहता है

बीच की छुट्टी पर हुए शोध में कोई उलझन नहीं है। एंथनी पेलेग्रिनी ने नियंत्रित अध्ययनों की समीक्षा की और पाया कि बच्चे जितनी देर बिना ब्रेक के बैठे रहते हैं, कक्षा के काम पर उनका ध्यान उतना ही घटता जाता है, और आधी छुट्टी (recess) के बाद वे पहले से ज़्यादा ध्यान देते हैं। उन्हें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि आधी छुट्टी काटने से पढ़ाई के नतीजे सुधरते हैं। अमेरिकन एकेडमी ऑफ़ पीडियाट्रिक्स ने 2013 में कहा कि आधी छुट्टी न सज़ा के तौर पर छीनी जाए, न पढ़ाई का अतिरिक्त समय निकालने के लिए। विश्व स्वास्थ्य संगठन रोज़ कम से कम एक घंटे की भाग-दौड़ वाली गतिविधि की सलाह देता है। रेजिना गुथोल्ड और उनके साथियों ने 298 सर्वेक्षणों को जोड़कर देखा तो पाया कि 2016 में दुनिया भर में 11 से 17 साल के लगभग 81 प्रतिशत स्कूली बच्चे इतना भी नहीं कर पाते थे, और लड़कियाँ लड़कों से ज़्यादा पीछे थीं।

यह नुकसान सिर्फ़ स्कूल की चारदीवारी के भीतर नहीं हो रहा। पीटर ग्रे ने दिखाया है कि बच्चों का अपना, खुला खेल लंबे समय से घटता गया है और उसी दौर में युवाओं में चिंता और अवसाद बढ़ा है। साथ ही वे साफ़ कहते हैं कि यह रिश्ता साबित नहीं हुआ है, बस उसकी ओर इशारा मिलता है। जिसने बचपन में गली में गिल्ली-डंडा खेला है, वह खुद से पूछ सकता है कि वे गलियाँ कहाँ गईं, और शाम का वह वक़्त कहाँ गया जो अब ट्यूशन और होमवर्क में खप जाता है।

“ध्यान बेहतर होता है” कहना काफ़ी क्यों नहीं

यहीं मेरी राह मैदान के ज़्यादातर हिमायतियों से अलग हो जाती है। आम दलील यह है कि खेल से फ़ायदा होता है। बच्चे दौड़ते हैं, शांत होकर लौटते हैं, ध्यान बेहतर लगाते हैं, और उनके अंक सुधरते हैं। यह सब सच है, पर यह सब खेल को कक्षा की गाड़ी के लिए पेट्रोल पंप मान लेता है। अगर दलील बस इतनी है, तो जिस दिन कोई दिखा देगा कि एक घंटे की अतिरिक्त दोहराई से अंक थोड़े और बढ़ते हैं, उस दिन मैदान हार जाएगा।

असली सवाल यह है कि बच्चा आख़िर है क्या। सीखने वाला कोई दिमाग़ नहीं है जिसे संयोग से कसरत की भी ज़रूरत पड़ जाती हो। सीखने वाला एक शरीर है जो पता लगा रहा है कि वह क्या-क्या कर सकता है, गिरने पर वह कितना भारी लगता है, कितनी दूर कूद सकता है, और कहाँ उसका अपना शरीर ख़त्म होकर दूसरे बच्चे का शरीर शुरू होता है। खुला मैदान बच्चे को यह सब करने का न्योता (affordance) देता है। स्कूल के पूरे दिन में यही एक जगह है जहाँ समय-सारणी नहीं, बच्चा खुद तय करता है कि उसका शरीर आगे क्या करेगा। खेल में बच्चे नियम बनाते हैं, तोड़ते हैं, झगड़ते हैं और फिर से गढ़ते हैं, और परिभाषा जानने से बहुत पहले ही इंसाफ़ का एहसास अपनी टाँगों और सीने में सीख लेते हैं।

मैदान के साथ और क्या खो जाता है

जब मैदान गायब होता है, तो सिर्फ़ बैठे रहने के घंटे लंबे नहीं होते। बच्चा दिन का वह इकलौता हिस्सा खो देता है जिस पर उसका अपना राज चलता था। वह छोटे-छोटे जोखिम खो देता है, जिनसे शरीर ऊँचाई और रफ़्तार का अंदाज़ा लगाना सीखता है। वह उन बच्चों का साथ खो देता है जो कतारों में बिठाए हुए नहीं हैं। जिस बचपन में शरीर का हर घंटा कोई और तय करता रहा हो, उससे कैसा बड़ा इंसान निकलेगा?

तीसरी बेंच वाले लड़के को शायद खाने से पहले दस मिनट मिल जाएँ। वह नीम तक दौड़कर जाएगा और लौटेगा, कमीज़ पसीने से भीग जाएगी, साँस फूली होगी। हो सकता है उसकी टीचर यह भी ग़ौर करें कि इसके बाद वह बेहतर सुनता है। पर साथ ले जाने लायक सवाल यह नहीं है कि उस दौड़ ने उसे बेहतर विद्यार्थी बनाया या नहीं। सवाल यह है कि वह मैदान, और वह समय, आख़िर किसका था।

इसे कक्षा में उतारें: P51 खुला खेल: बच्चे खेलें तो शिक्षक क्या करें · P52 पुराने खेल, गहरी सीख: लंगड़ी, पकड़म-पकड़ाई और रस्सी कूद · P54 खुली चीज़ें: डंडियाँ, पत्थर और मनचाहा खेल

आगे पढ़ें: R43 खेल: शरीर का अपना पाठ्यक्रम · R60 शारीरिक शिक्षा एक “पीरियड”: शरीर को समय-सारणी में जगह कैसे मिली

संदर्भ

  1. Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009 (India), Schedule: Norms and Standards for a School, item 2(vi), Playground.
  2. Kerala High Court, Prakash N. v. Government Welfare Lower Primary School, judgment of 11 April 2024 (Justice P. V. Kunhikrishnan), 2024 SCC OnLine Ker 1806.
  3. Ministry of Education, Government of India, UDISE+ 2024–25, Table 2.5, number of schools having a playground (1,221,231 of 1,471,473 schools).
  4. Central Board of Secondary Education, Circular No. Acad-10/2018, 21 March 2018, Health and Physical Education for Classes IX to XII.
  5. Pellegrini, A. D. (2008). The recess debate: A disjuncture between educational policy and scientific research. American Journal of Play, Fall 2008, 182–190.
  6. Murray, R., Ramstetter, C., and Council on School Health (2013). The crucial role of recess in school. Pediatrics, 131(1), 183–188.
  7. World Health Organization (2011). Global Recommendations on Physical Activity for Health: 5–17 years old. Geneva: WHO.
  8. Guthold, R., Stevens, G. A., Riley, L. M., and Bull, F. C. (2020). Global trends in insufficient physical activity among adolescents: a pooled analysis of 298 population-based surveys with 1·6 million participants. The Lancet Child & Adolescent Health, 4(1), 23–35.
  9. Gray, P. (2011). The decline of play and the rise of psychopathology in children and adolescents. American Journal of Play, 3(4), 443–463.

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