वह पल
दोपहर के खाने के बाद का तीसरा पीरियड है। ऊपर पंखा घूम रहा है, पर हवा ठंडी नहीं होती, बस गर्मी कमरे में इधर से उधर सरकती रहती है। खिड़की के पास बैठा एक लड़का बेंच पर इतना नीचे खिसक आया है कि उसकी ठुड्डी लगभग कॉपी को छू रही है। शिक्षिका बोर्ड पर “वाष्पीकरण” लिखती हैं, मुड़ती हैं, और देखती हैं कि चालीस बच्चे बैठे तो कक्षा में हैं, पर उनका मन कब का बाहर निकल चुका है।
आमतौर पर या तो डाँट पड़ती है, या थोड़ी-सी स्ट्रेचिंग करवा दी जाती है, जिसका पाठ से कोई लेना-देना नहीं होता। एक मिनट को राहत मिलती है, फिर मन दोबारा भटकने लगता है। छोटा शरीर बहुत देर तक एक जगह टिककर नहीं बैठ सकता। तो क्यों न वह एक मिनट की हलचल पढ़ाई से छुट्टी न होकर, खुद पढ़ाई का हिस्सा बन जाए?
अभ्यास
पाठ से जुड़ी हलचल (content-carrying movement break) दो से पाँच मिनट की होती है। यह पाठ के बीच में आती है और इसके लिए हर बच्चे की सीट के पास की थोड़ी-सी जगह काफ़ी है। तीस मिनट से लंबे किसी भी पाठ में इसे एक या दो बार, पूरी कक्षा के साथ एक साथ कराइए। कोई सामान नहीं चाहिए।
शुरुआत में आज के पाठ से वह एक बात चुनिए जिसमें कोई आकार हो, कोई दिशा हो या कोई लय हो। भाप ऊपर उठती है। दस से गुणा करने पर हर अंक एक घर बाईं ओर खिसक जाता है।
फिर उस बात को शरीर की एक हरकत दीजिए। जल-चक्र के लिए बच्चे पहले तालाब के पानी की तरह नीचे झुककर बैठें। धूप लगने पर हथेलियाँ रगड़कर गरम करें, और फिर भाप बनकर धीरे-धीरे पंजों के बल ऊपर उठें। ऊपर पहुँचकर दोनों हाथों के बीच बादल बनाएँ और उँगलियों के बीच से बारिश नीचे गिरा दें, और हर हरकत के साथ उसका शब्द ज़ोर से बोलते रहें। सही-ग़लत वाले सवालों में बच्चे सही पर खड़े हों और ग़लत पर बैठ जाएँ। गिनती में वे दो-दो करके गिनें और हर सम संख्या पर ताली बजाएँ।
यह क्रम दो-तीन बार दोहराइए। पहली बार आप आगे-आगे करें और बच्चे आपको देखकर वैसा ही करें। दूसरी बार आप सिर्फ़ शब्द बोलें। तीसरी बार कोई बच्चा आगे आकर हरकत कराए और पूरी कक्षा शब्द बोले।
आख़िर में एक धीमी, लंबी साँस के साथ सबको अपनी जगह बिठाइए और एक ऐसा सवाल पूछिए जिसका जवाब उसी बात से निकले। “गड्ढे का पानी सूख जाता है, तो आख़िर जाता कहाँ है?”
हरकतें उतनी ही बड़ी रखिए जितनी कमरे में जगह हो। बस्ते रास्ते से हटा दीजिए, कतारों के बीच कूदने को कभी मत कहिए, और हर हरकत का बैठे-बैठे करने वाला रूप भी बताइए, ताकि जो बच्चा खड़ा नहीं हो सकता या नहीं होना चाहता, वह भी शामिल रहे।
किन बातों पर नज़र रखें
जब बात बन रही होती है, तो चेहरे ऊपर उठते हैं, कंधे ढीले पड़ जाते हैं, और बाद में कॉपी में “भाप” लिखते हुए किसी बच्ची का हाथ अपने आप धीरे से ऊपर उठ जाता है। दो मिनट कक्षा में शोर ज़्यादा होता है, और उसके बाद के बीस मिनट शांति ज़्यादा।
जब बात नहीं बन रही होती, तो हरकत पाठ से छूट जाती है। बच्चे शब्द बोलने की जगह खिलखिलाते हैं, या हर बार हरकतें और बेकाबू होती जाती हैं। तब हरकतें छोटी और धीमी कीजिए और उन्हें फिर से शब्दों से बाँधिए। कोई बच्चा मना करे, तो उसे देखने दीजिए और अपनी जगह से शब्द बोलने दीजिए। झिझकने वाला बच्चा ज़िद नहीं कर रहा, और बहुत-से बच्चे तीसरे हफ़्ते तक खुद जुड़ जाते हैं।
अगर महीनों बाद भी कोई बच्चा आसान हरकतों की नकल न कर पाए या बार-बार संतुलन खो दे, तो माता-पिता से नरमी से बात कीजिए और बच्चों के डॉक्टर या ऑक्युपेशनल थेरेपिस्ट से जाँच कराने की सलाह दीजिए।
यह क्यों काम करता है
मिर्तो माविलिडी और उनके साथियों ने नब्बे प्री-स्कूल बच्चों को सौरमंडल के ग्रह, सूरज से उनके क्रम में, सिखाए। एक समूह ने पाठ से मेल खाती हरकतें कीं, दूसरे ने ऐसी हरकतें जिनका पाठ से कोई लेना-देना नहीं था, और तीसरा ज़्यादातर बैठकर पढ़ा। जिन बच्चों की हरकतों में पाठ था, उन्हें सबसे ज़्यादा याद रहा, उसी समय भी और छह हफ़्ते बाद भी, और बैठकर पढ़ने वालों से ज़्यादा मज़ा भी आया [1]। मैथ्यू माहर की टीम ने देखा कि शिक्षक के कराए दस मिनट के हलचल वाले विराम के बाद लगभग नौ साल के बच्चे काम पर ज़्यादा देर टिके, और सबसे ज़्यादा फ़ायदा उन्हें हुआ जिनका मन पहले सबसे कम लगता था [2]।
अमांडा वॉटसन और एमा नॉरिस के समूहों की समीक्षाएँ भी इसी ओर इशारा करती हैं। पाठ के दौरान साफ़ फ़ायदा दिखता है और कुल नतीजों में थोड़ा कम, हालाँकि दोनों चेताती हैं कि अध्ययनों की गुणवत्ता में बहुत फ़र्क़ है [3, 4]। पाठ से जुड़ी हलचल मदद करती दिखती है, और इसमें खर्च लगभग कुछ नहीं।
इसकी गहरी वजह इस संग्रह की Roots शृंखला में है। जानना भी करने का ही एक रूप है। जिस शरीर ने खुद भाप बनकर ऊपर उठने का अनुभव किया है, उसमें यह बात उस मन से अलग तरह से बैठती है जिसने सिर्फ़ शब्द पढ़ा है। ध्यान लगाना भी शरीर का ही काम है। इसीलिए बिल्कुल स्थिर बैठा बच्चा भी मन से कोसों दूर हो सकता है। चुपचाप बैठे रहना ध्यान नहीं है। यह विराम पाठ का समय नहीं चुराता। यह पाठ को टिकने की जगह देता है।
यह क्यों काम करता है: R2 | Enaction: knowing as a form of doing, R50 | When stillness is mistaken for attention, R11 | Gesture as thinking: what the hands know before words, R12 | Attention is a bodily act, not a mental effort
चलना-फिरना में अगला: P29 | Balance games and the attending child
संदर्भ (Notes)
- Mavilidi, M. F., Okely, A. D., Chandler, P., & Paas, F. (2017). Effects of integrating physical activities into a science lesson on preschool children’s learning and enjoyment. Applied Cognitive Psychology, 31(3), 281-290.
- Mahar, M. T., Murphy, S. K., Rowe, D. A., Golden, J., Shields, A. T., & Raedeke, T. D. (2006). Effects of a classroom-based program on physical activity and on-task behavior. Medicine & Science in Sports & Exercise, 38(12), 2086-2094.
- Watson, A., Timperio, A., Brown, H., Best, K., & Hesketh, K. (2017). Effect of classroom-based physical activity interventions on academic and physical activity outcomes: a systematic review and meta-analysis. International Journal of Behavioral Nutrition and Physical Activity, 14, 114.
- Norris, E., van Steen, T., Direito, A., & Stamatakis, E. (2020). Physically active lessons in schools and their impact on physical activity, educational, health and cognition outcomes: a systematic review and meta-analysis. British Journal of Sports Medicine, 54(14), 826-838.