Practices · Breath and settling

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मिलकर गुनगुनाना: आवाज़ से कक्षा को ठहराना

वह पल

तीसरे पीरियड की घंटी बज चुकी है, पर कक्षा ने जैसे सुनी ही नहीं। कोई बेंच घसीटता है और उसकी चरमराहट कानों में चुभ जाती है। ऊपर पंखा घूम रहा है, और तीस आवाज़ें उसके साथ ऊँची होती जा रही हैं। अध्यापिका ऐसे शोर के ऊपर पहले भी कई बार चिल्ला चुकी हैं, और उन्हें पता है कि उसका नतीजा क्या निकलता है। डेढ़ मिनट की चुप्पी, दोपहर तक बैठा हुआ गला, और एक ऐसी कक्षा जो चुप तो हो गई, पर ठहरी नहीं।

अगर वे शोर के ऊपर चिल्लाने के बजाय कक्षा को एक ऐसी आवाज़ दें जिसमें सब शामिल हो सकें, तो क्या होगा?

अभ्यास

शुरुआत ख़ुद से कीजिए। होंठ बंद रखिए और किसी आरामदायक, नीचे सुर में धीरे-धीरे गुनगुनाइए। न कोई घोषणा कीजिए, न चुप रहने को कहिए। एक लंबी साँस छोड़ने तक गुनगुनाते रहिए, फिर नाक से साँस लीजिए और दोबारा गुनगुनाइए। कुछ ही साँसों में पास बैठे बच्चों का ध्यान इस ओर जाएगा।

फिर सामान्य आवाज़ में सबको बुलाइए। “होंठ बंद करो, एक हथेली छाती या गाल पर रखो और मेरे साथ गुनगुनाओ। देखो, कैसी झनझनाहट होती है।” पाँच-छह धीमी साँसों तक, यानी लगभग एक मिनट, सब साथ गुनगुनाएँ। हर गुनगुनाहट उतनी ही लंबी हो जितनी साँस आराम से चले, उससे ज़्यादा नहीं। जिस बच्चे की साँस बीच में ख़त्म हो जाए, वह बस साँस ले और फिर से साथ जुड़ जाए।

आख़िर में आवाज़ को छोटा होने दीजिए। हर बार पिछली बार से थोड़ा धीमा, जब तक आख़िरी गुनगुनाहट लगभग सुनाई ही न दे। उसके बाद जो शांति आए, उसे कुछ पल वैसे ही रहने दीजिए, उसे बातों से मत भरिए। फिर धीमी आवाज़ में पाठ शुरू कीजिए।

पूरा अभ्यास एक-दो मिनट का है। चालीस बच्चे हों या छह, यह दोनों में चलता है, और इसके लिए किसी सामान की ज़रूरत नहीं पड़ती। इसे एक काम से दूसरे काम पर जाते समय, खेलकर लौटने के बाद या दिन की शुरुआत में कीजिए। इसे दिन में एक बार तक ही रखिए, ताकि यह कभी हुक्म चलाने का औज़ार न बने। सुरक्षा की बात भी याद रखिए। बच्चों से कभी साँस रोकने को न कहें, उँगलियों से कानों को ज़ोर से दबाने को न कहें, और जो बच्चा सिर्फ़ सुनना चाहे, उसे आराम से बैठकर सुनने दें।

किन बातों पर नज़र रखें

जब अभ्यास काम कर रहा होता है, तो उसका असर सबसे पहले कंधों में दिखता है। कंधे ढीले होकर नीचे आ जाते हैं। जबड़ा ढीला पड़ता है, हाथों की बेचैनी थमती है, और साँस छोड़ना साँस लेने से लंबा होने लगता है। आख़िरी गुनगुनाहट के बाद की चुप्पी तनी हुई नहीं, भरी-भरी लगती है, और आपके अगले सवाल का पहला जवाब धीमी आवाज़ में आता है।

जब असर नहीं हो रहा होता, तो हँसी घटने के बजाय बढ़ती जाती है, या बच्चे एक-दूसरे से ज़्यादा ज़ोर से गुनगुनाने की होड़ लगाने लगते हैं। पहले हफ़्ते में हँसी आना स्वाभाविक है। आप शांति से गुनगुनाते रहिए, अक्सर यह अपने आप थम जाती है। ज़ोर की होड़ का मतलब है कि गुनगुनाना ताक़त दिखाने का खेल बन गया है, तो आवाज़ और धीमी कीजिए, ऊँची नहीं। जो बच्चा मना करे, उसे चुपचाप बैठने दीजिए। मना करना ज़िद नहीं, एक संकेत है। कुछ बच्चों को समूह की आवाज़ भारी लगती है, और कुछ दूसरों के सामने अपनी आवाज़ निकालने में झिझकते हैं। ऐसे बच्चे मेज़ पर हथेली रखकर उसकी थरथराहट महसूस कर सकते हैं।

अगर कोई बच्चा आवाज़ों से परेशान दिखता है, बार-बार कान ढक लेता है, या साँस के सरल अभ्यासों में भी हाँफने या घबराने लगता है, तो माता-पिता से नरमी से बात कीजिए। अगर यह बना रहे, तो स्कूल के काउंसलर या डॉक्टर की मदद लीजिए।

यह क्यों काम करता है

गुनगुनाना असल में एक लंबी, धीमी साँस छोड़ना है, जिसे हम सुन सकते हैं, और यही धीमापन सबसे अहम है। किशोरों पर हुए एक छोटे अध्ययन में महेशकुमार कुप्पुसामी और उनके साथियों ने पाया कि भ्रामरी प्राणायाम (गुनगुनाते हुए साँस छोड़ने का अभ्यास) के सिर्फ़ एक सत्र के बाद धड़कन और रक्तचाप कम हुए, जबकि सामान्य ढंग से साँस लेने वाले समूह में ऐसा नहीं हुआ। रोडेरिक गेरिट्सन और गीडो बैंड का तर्क है कि इस तरह सधी हुई साँस शरीर का संतुलन तंत्रिका तंत्र (nervous system) के उस हिस्से की ओर झुका देती है जो उसे शांत करता है। पुराने योग ग्रंथ यह अनुभव जानते थे, भले ही इसके पीछे की प्रक्रिया न जानते हों। हठयोग प्रदीपिका भौंरे जैसी आवाज़ के साथ साँस छोड़ने की बात करती है और कहती है कि इससे मन में आनंद उठता है।

जब ब्यॉर्न विकहॉफ़ और उनकी टीम ने युवाओं से एक सुर में गुनगुनाने और गाने को कहा, तो उनके दिल की धड़कनें साथ-साथ तेज़ और धीमी होने लगीं। सेबास्टियन किर्शनर और माइकल टोमासेलो ने पाया कि जिन चार साल के बच्चों ने अभी-अभी साथ मिलकर गाया-बजाया था, वे बाद में एक-दूसरे की मदद और सहयोग ज़्यादा करते थे। एक मिनट के लिए साझी आवाज़ साझा शरीर बन जाती है।

ध्यान कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसे बच्चा ज़ोर लगाकर बुला ले। वह साँस पर और शरीर की भीतरी हालत पर टिका होता है। कक्षा तब ठहरती है जब उसमें बैठे शरीर ठहरते हैं, और शरीर अकेले के बजाय साथ में ज़्यादा आसानी से ठहरते हैं। तो अगर एक मिनट की गुनगुनाहट वह कर सकती है जो दस मिनट की डाँट नहीं कर पाती, तो बच्चों को चुप कराने के हमारे आम तरीक़े के बारे में यह क्या कहता है?

यह क्यों काम करता है: R14 प्राण: साँस और ध्यान की लय, R12 ध्यान शरीर की क्रिया है, मन की मेहनत नहीं, R10 साझा अर्थ-निर्माण: दो शरीर मिलकर कैसे समझते हैं, R41 आवाज़: बोलना, गाना और भाषा का शरीर

साँस और ठहराव में आगे: P9 शोर से शांति तक: दो मिनट का बदलाव

संदर्भ (Notes)

  1. Kuppusamy, M., Kamaldeen, D., Pitani, R., & Amaldas, J. (2016). Immediate effects of Bhramari pranayama on resting cardiovascular parameters in healthy adolescents. Journal of Clinical and Diagnostic Research, 10(5), CC17-CC19. https://doi.org/10.7860/JCDR/2016/19202.7894
  2. Gerritsen, R. J. S., & Band, G. P. H. (2018). Breath of life: The respiratory vagal stimulation model of contemplative activity. Frontiers in Human Neuroscience, 12, 397. https://doi.org/10.3389/fnhum.2018.00397
  3. Svātmārāma, Haṭha Yoga Pradīpikā, 2.68 (bhrāmarī). Translation consulted at nathas.org, https://www.nathas.org/en/dictionary/bhramari/
  4. Vickhoff, B., Malmgren, H., Åström, R., et al. (2013). Music structure determines heart rate variability of singers. Frontiers in Psychology, 4, 334. https://doi.org/10.3389/fpsyg.2013.00334
  5. Kirschner, S., & Tomasello, M. (2010). Joint music making promotes prosocial behavior in 4-year-old children. Evolution and Human Behavior, 31(5), 354-364. https://doi.org/10.1016/j.evolhumbehav.2010.04.004

Ages 6–8For teachers

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