Practices · Rest, reflection and leaving

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“आज तुम्हारे शरीर ने क्या सीखा?”

वह पल

छुट्टी से दस मिनट पहले का वक़्त है। बस्ते आधे बँध चुके हैं, किसी की पानी की बोतल लुढ़ककर बेंच के नीचे चली गई है, और पंखा तीस थके हुए सिरों पर गरम हवा फेंक रहा है। टीचर पूछती हैं, “आज क्या सीखा?” कुछ आवाज़ें विषयों के नाम गिनाती हैं। गणित। अंग्रेज़ी। पौधों वाला पाठ। जो बोलते हैं, वे दिन को याद नहीं कर रहे, बस समय-सारणी दोहरा रहे हैं।

पर इन्हीं बच्चों ने सुबह गलियारे को कदमों से नापा था, और घंटे भर अक्षरों वाले पन्ने पर ऐसे झुके रहे थे कि उँगलियाँ दुखने लगी थीं। इस सबमें उनका शरीर पूरी तरह शामिल था। बस सवाल वहाँ तक कभी पहुँचा ही नहीं।

अभ्यास

दिन के आख़िरी पाँच से सात मिनट में बच्चों को गोले में बिठा लें या खड़ा कर लें। किसी सामान की ज़रूरत नहीं है। छोटे बच्चों के लिए बोर्ड पर इंसान की एक सीधी-सादी आकृति बना दें तो मदद मिलती है। इसे रोज़ करें, पूरी कक्षा के साथ या दस-पंद्रह बच्चों के समूहों में।

शुरुआत सवाल बदलने से करें। पूछें, “आज तुम्हारे शरीर ने क्या सीखा?” और फिर रुक जाएँ। किसी के जवाब देने से पहले कम से कम पाँच धीमी साँसों जितनी चुप्पी रहने दें। शुरू के कुछ दिन अटपटे लगेंगे। कोई बात नहीं।

फिर उनसे कहें कि बताने से पहले करके दिखाएँ। जिसने रस्सी कूदना सीखा, वह एक छोटी-सी उछाल दिखाए। जिसे लिखने में मुश्किल हुई, वह थका हुआ हाथ उठाकर झटक दे। जिसने कोई सवाल हल किया, वह हवा में उस अंक की आकृति बना दे। हरकत के बाद ही एक वाक्य माँगें। फिर पूछें, “कहाँ महसूस हुआ?” हाथों में, पैरों में, पेट में, सीने में, गले में। बच्चे अपने ही शरीर की ओर इशारा करें या बोर्ड की आकृति की ओर। हर बच्चा सिर्फ़ ख़ुद को छुए, किसी दूसरे को कभी नहीं।

पहले हफ़्ते आप ख़ुद करके दिखाएँ। “आज मेरी आवाज़ ने कुछ सीखा। दोपहर तक वह थक गई थी, और छुट्टी के बाद मैं धीरे बोली तो तुम सबने ज़्यादा ध्यान से सुना।” आपकी यह ईमानदारी बच्चों को भी खुलकर बोलने का भरोसा देती है।

आख़िर में दो-तीन बच्चों से पूछें कि आज उनके शरीर को क्या मुश्किल लगा। उसे सुधारने या उसकी तारीफ़ करने न बैठें। बस इतना कहें, “शुक्रिया, कल हम यह याद रखेंगे।” फिर समापन के गोले या विदाई की ओर बढ़ें।

किन बातों पर ध्यान दें

जब यह असर कर रहा होता है, तो मुँह से पहले हाथ जवाब देने लगते हैं। बच्चे बिना पूछे शरीर की जगहें बताने लगते हैं, ज़ोर से पढ़ने से पहले पेट में हुई हलचल, खाने के बाद पैरों की बेचैनी। जो चुप बच्चा पाठ के दौरान कभी नहीं बोलता, हो सकता है वही सबसे पहले कोई हरकत करके दिखाए।

जब यह असर नहीं कर रहा होता, तो जवाब गोल-मोल रहते हैं (“मेरे दिमाग़ ने गणित सीखा”) या सब बच्चे पहले बोलने वाले की हूबहू नक़ल करते हैं। थोड़ी नक़ल स्वाभाविक है, क्योंकि छोटे बच्चे कोई नया ढंग देखादेखी ही सीखते हैं। अगर हफ़्तों तक यही चले, तो सवाल छोटा कर दें। “आज तुम्हारे हाथों ने क्या किया?”

जो बच्चा हिस्सा न लेना चाहे, उसे हर बार बिना कुछ कहे छोड़ दें। कई बच्चे हफ़्ते भर देखने के बाद ख़ुद जुड़ जाते हैं। जो बच्चा हिलना-डुलना न चाहे, वह शायद दिन को चित्र में उतारना पसंद करे। अगर कोई बच्चा बार-बार कहे कि कहीं दर्द है, या अपने शरीर को लेकर परेशान दिखे, तो माता-पिता से अकेले में बात करें, और बात बार-बार लौटे तो डॉक्टर या काउंसलर से मिलने की सलाह दें।

यह क्यों काम करता है

जॉन डिवी ने सोच-विचार (reflection) का मतलब बताया था, अपनी किसी मान्यता को उसके आधारों के साथ सक्रिय, लगातार और सावधानी से परखना। शरीर से पूछा गया सवाल बच्चों को पीरियडों के नामों की जगह सीधे अपने अनुभव तक लौटा ले जाता है। हाईस्कोप (HighScope) नाम के प्रीस्कूल कार्यक्रम में बरसों से काम के समय के बाद याद करने का दस-पंद्रह मिनट का समय रखा जाता है, जिसमें बच्चे बताते हैं कि उन्होंने क्या किया और क्या सीखा।

पहले करके दिखाना भी मायने रखता है। सूज़न वैगनर कुक, ज़ैकरी मिशेल और सूज़न गोल्डिन-मीडो ने तीसरी और चौथी कक्षा के बच्चों को गणित का एक तरीक़ा सिखाया। जिन बच्चों से सीखते समय हाथों से इशारे (gesture) करवाए गए, उन्हें चार हफ़्ते बाद भी ज़्यादातर बात याद थी। जिन्होंने सिर्फ़ शब्द दोहराए, वे काफ़ी कुछ भूल गए।

क्या छह साल का बच्चा सचमुच बता सकता है कि कोई भावना शरीर में कहाँ रहती है? यारी हिएतानेन और उनके साथियों ने पाया कि छह साल के बच्चे भी कुछ भावनाओं को शरीर में होने वाली अलग-अलग अनुभूतियों से जोड़ पाते हैं, और उम्र के साथ शरीर के ये नक़्शे साफ़ होते जाते हैं। इसे शरीर के भीतर की अनुभूति (interoception) कहते हैं, और किसी भी इंद्रिय की तरह यह ध्यान देने से तेज़ होती है। डेविड व्हाइटब्रेड और उनकी टीम ने दिखाया कि शिक्षक तीन से पाँच साल के बच्चों में अपनी सीख के बारे में सोचने के संकेत उनके कामों में भी देख सकते हैं, सिर्फ़ उनकी बातों में नहीं। अगर बच्चे पहले से अपने शरीर के ज़रिए सोच-विचार कर रहे हैं, तो हम उनसे जवाब सिर्फ़ शब्दों में ही क्यों माँगते रहते हैं?

यह क्यों काम करता है, इसकी जड़ें: R19 अनुभव: ज्ञान का एक स्रोत (Anubhava: experience as a source of knowledge); R11 हाव-भाव भी सोचना है (Gesture as thinking: what the hands know before words); R9 शरीर के भीतर की अनुभूति (Interoception: how hunger, fear and calm shape readiness to learn); R33 डिवी: अनुभव और शिक्षा (Dewey: experience and education)

आराम, सोच-विचार और विदाई में अगला: P58 दिन को चित्र में उतारना: बिना लिखे सोच-विचार (Drawing the day: reflection without writing)

टिप्पणियाँ (Notes)

  1. Dewey, J. (1910). How We Think. Boston, D. C. Heath. Chapter 1, “What Is Thought?” https://gutenberg.org/files/37423/37423-h/37423-h.htm
  2. New Jersey Department of Education, Division of Early Childhood Education. HighScope Daily Routine. https://www.nj.gov/education/earlychildhood/preschool/docs/HighScopeDailyRoutine.pdf
  3. Cook, S. W., Mitchell, Z., & Goldin-Meadow, S. (2008). Gesturing makes learning last. Cognition, 106(2), 1047–1058. https://doi.org/10.1016/j.cognition.2007.04.010
  4. Hietanen, J. K., Glerean, E., Hari, R., & Nummenmaa, L. (2016). Bodily maps of emotions across child development. Developmental Science, 1–8 (online first). https://doi.org/10.1111/desc.12389
  5. Whitebread, D., Coltman, P., Pino-Pasternak, D., Sangster, C., Grau, V., Bingham, S., Almeqdad, Q., & Demetriou, D. (2009). The development of two observational tools for assessing metacognition and self-regulated learning in young children. Metacognition and Learning, 4(1), 63–85. https://doi.org/10.1007/s11409-008-9033-1

Ages 3–6Ages 6–8For teachers

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