Roots · The developing body

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जन्म से पहले: गर्भ में शरीर क्या सीखने लगता है

शाम ढल चुकी है और रसोई में अब भी गरम तेल में चटकती राई की महक भरी है। आठवें महीने की एक गर्भवती स्त्री पीढ़े पर बैठी है। एक हाथ पेट की गोलाई पर टिका है, दूसरे से वह दाल चला रही है। बगल के कमरे से सास वही पुराना भजन गुनगुना रही हैं जो वे हर रात गुनगुनाती हैं। हथेली के नीचे कुछ हिलता है, पहले धीमी सी करवट और फिर पसलियों पर एक तेज़ धक्का। वह हँसती है और आवाज़ देकर कहती है कि बच्चा सुन रहा है।

क्या वह सही है? महाभारत की लोकप्रिय कथा में अभिमन्यु माँ सुभद्रा के गर्भ में रहते हुए ही चक्रव्यूह (युद्ध की एक घुमावदार व्यूह-रचना) में घुसने का तरीका सुन लेता है, पर उससे बाहर निकलने वाला हिस्सा सुनने से चूक जाता है। कहानी सुंदर है, और है कहानी ही। असली सवाल यह है कि जन्म से पहले शरीर सचमुच क्या सीखने लगता है, और सबूत कहाँ जाकर रुक जाते हैं।

सुनने से पहले शरीर हिलता है

गर्भ में शिशु की हलचल अल्ट्रासाउंड पर लगभग साढ़े आठ से साढ़े नौ हफ़्ते में पहली बार दिखने लगती है। गर्भ में शिशु अँगूठा भी चूसते हैं, और पीटर हेपर और उनके साथियों ने पाया कि ज़्यादातर शिशु किसी एक अँगूठे को पसंद करते हैं, अक्सर दाएँ को। बरसों बाद, जिन बच्चों को उन्होंने आगे तक देखा उनमें से ज़्यादातर में वही अँगूठा बता गया कि बच्चा किस हाथ से लिखेगा। यहीं से धीरे-धीरे अपने अंगों की स्थिति को महसूस करने की समझ शुरू होती है।

सुनना बाद में आता है। हेपर और बाबू शाहिदुल्लाह ने माँ के पेट के ऊपर से अलग-अलग स्वर बजाए। पहली प्रतिक्रिया लगभग 19 हफ़्ते पर दिखी, और वह भी केवल एक नीचे स्वर पर। ऊँचे स्वर धीरे-धीरे जुड़े, और 33 से 35 हफ़्ते तक हर शिशु ने उन सभी स्वरों पर प्रतिक्रिया दी जो जाँचे गए थे।

सबूत क्या कहते हैं

एंथनी डीकैस्पर और विलियम फ़ाइफ़र ने 1980 में दिखाया कि नवजात शिशु किसी दूसरी स्त्री की तुलना में अपनी माँ की आवाज़ को ज़्यादा पसंद करते हैं। छह साल बाद डीकैस्पर और मेलानी स्पेंस ने माँओं से गर्भ के आख़िरी हफ़्तों में एक ही अंश बार-बार ज़ोर से पढ़ने को कहा। जन्म के बाद शिशुओं ने वही अंश ज़्यादा पसंद किया। फ़िनलैंड में ईनो पार्तानेन और उनके साथियों ने 29वें हफ़्ते से गर्भस्थ शिशुओं को एक गढ़ा हुआ शब्द “ततता” (tatata) सुनाया। जन्म के बाद, जिन शिशुओं ने वह शब्द सुना था उनके मस्तिष्क ने उस शब्द पर और उसमें आए छोटे बदलावों पर ज़्यादा तेज़ प्रतिक्रिया दी। बिर्गिट माम्पे, कैथलीन वर्मके और उनके साथियों ने पाया कि कुछ ही दिन के फ़्रांसीसी नवजात अक्सर ऊपर उठती धुन में रोते हैं और जर्मन नवजात नीचे गिरती धुन में, और दोनों अपनी-अपनी भाषा की धुन दोहराते हैं। स्वाद भी यहीं से शुरू होता है। जूली मेनेला और उनके साथियों ने पाया कि जिन माँओं ने गर्भ के दौरान या स्तनपान के समय गाजर का रस पिया, उनके शिशुओं को दूध छुड़ाते समय गाजर के स्वाद वाला दलिया ज़्यादा भाया।

ध्यान दीजिए कि ये अध्ययन क्या दिखाते हैं। वे परिचय दिखाते हैं। नवजात ने एक आवाज़ की धुन सीखी है, एक भाषा की लय सीखी है, एक रसोई का स्वाद सीखा है। वे यह नहीं दिखाते कि गर्भस्थ शिशु शब्दों के अर्थ समझता है, तथ्य याद रखता है या मूल्य ग्रहण करता है।

सबूत कहाँ ख़त्म होते हैं

एक और दावा है। 1993 में कॉलेज के 36 विद्यार्थियों पर हुए एक अध्ययन में मोत्सार्ट का संगीत सुनने के बाद एक स्थानिक काम में थोड़ी देर का सुधार दिखा। 1998 तक अमेरिका के जॉर्जिया राज्य के गवर्नर यह प्रस्ताव रख रहे थे कि राज्य में जन्मे हर बच्चे को शास्त्रीय संगीत की एक कैसेट या सीडी दी जाए। 2010 में याकोब पीत्शनिग और उनके साथियों ने लगभग चालीस अध्ययनों को एक साथ परखा और इस प्रभाव का कोई समर्थन नहीं पाया। हमारे यहाँ, 2023 में शुरू हुए एक गर्भ संस्कार (गर्भावस्था के संस्कार और शिक्षा) अभियान ने दावा किया कि गर्भ में शिशु 500 शब्द तक सीख सकता है। मुझे ऐसा कोई अध्ययन नहीं मिला जो इस तरह की कोई बात दिखाता हो। सबूत परिचय पर आकर रुक जाते हैं, और किसी ने यह नहीं दिखाया कि गर्भस्थ शिशु को कुछ भी सुनाने से बच्चा ज़्यादा होशियार बनता है।

बच्चा कोरा पैदा नहीं होता

गर्भ में सीखने के पक्ष में आम तर्क एक दौड़ का है। जल्दी शुरू करो, आगे निकलो, और गर्भ पहला कोचिंग सेंटर बन जाता है। सबूत किसी शांत दिशा की ओर इशारा करते हैं। बच्चा कोरा पैदा नहीं होता। वह पहले से कुछ जानता हुआ आता है, और वह जानना उसके शरीर में होता है। वह एक आवाज़ को उसके उतार-चढ़ाव से पहचानती है, एक भाषा की ताल को पहचानती है। महीनों से वह लात मारती रही है, करवट लेती रही है, अँगूठा चूसती रही है। उसकी पहली सीख एक शरीर का उस दुनिया के साथ सुर मिलाना था जिसके भीतर वह बढ़ रहा था। सन्निहित संज्ञान (embodied cognition) का अपने सबसे शुरुआती रूप में यही अर्थ है। सोचना सिर में शुरू होकर फिर नीचे शरीर में नहीं उतरता। वह एक शरीर के दूसरे शरीर के भीतर जीने से शुरू होता है।

इससे स्कूल के पहले दिन को देखने का हमारा नज़रिया बदलना चाहिए। कक्षा 1 की वह बच्ची जो टिककर नहीं बैठ पाती और धीमे-धीमे कुछ गुनगुनाती रहती है, शून्य से शुरू नहीं कर रही। वह नाम मिलने से पहले से हलचल और आवाज़ के ज़रिए सीखती आ रही है। हमारे स्कूल अक्सर उस शरीर को एक समस्या मानते हैं। उसे उसका पहला शिक्षक मानने का क्या अर्थ होगा?

फिर से उस रसोई में चलिए। दाल चलाती वह स्त्री आधी सही थी। शिशु भजन के शब्द नहीं सीख रहा। वह गुनगुनाहट सीख रहा है, एक आवाज़ की गर्माहट सीख रहा है, रात-दर-रात दोहराई जाती एक शाम की लय सीख रहा है। इंसान की शुरुआत यहीं से होती है। अगर पहला पाठ्यक्रम एक शरीर के भीतर से सुनी गई आवाज़ है, तो हमारी कक्षाएँ बच्चों को बढ़ने के लिए कौन सी आवाज़ देती हैं?

इसे व्यवहार में लाएँ: P8 Humming together: settling a room through sound (साथ गुनगुनाना: आवाज़ से कक्षा को शांत करना) · P22 Call and response: language through rhythm (पुकार और जवाब: लय के ज़रिए भाषा) · P24 Sound play and tongue twisters for early reading (शुरुआती पढ़ाई के लिए ध्वनि-खेल और जीभ-घुमाऊ वाक्य)

आगे पढ़ें: R38 Movement before words: crawling, balance and the first two years (शब्दों से पहले हलचल: घुटनों चलना, संतुलन और पहले दो साल) · R41 Voice: speaking, singing and the body of language (आवाज़: बोलना, गाना और भाषा का शरीर)

संदर्भ

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