Practices · Number through the body

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ज़मीन पर बने आकार: ज्यामिति, जिस पर चलकर सीखें

वह पल

ब्लैकबोर्ड पर चॉक चरमराती है। शिक्षिका एक त्रिभुज बनाती हैं, नीचे चौड़ा आधार और ऊपर नुकीला सिरा। “इसकी कितनी भुजाएँ हैं?” पूरी कक्षा एक सुर में बोलती है, “तीन!” ऊपर पंखा धीरे-धीरे घूम रहा है और गर्म हवा में चॉक की धूल तैर रही है। फिर वे उसे मिटाकर दूसरा त्रिभुज बनाती हैं, इस बार लंबा, पतला और एक कोने के बल टिका हुआ। दूसरी पंक्ति से एक महीन-सी आवाज़ आती है, “यह त्रिभुज नहीं है।” उसे यह कुछ ग़लत-सा लग रहा है। दो-तीन सिर हामी में हिलते हैं।

वह आकार का नाम जानती है, भुजाएँ भी गिन लेती है। पर असल में वह इतना ही जानती है कि किताब में त्रिभुज आम तौर पर कैसा दिखता है, और यह बिल्कुल अलग बात है।

अभ्यास

शुरुआत कक्षा से बाहर कीजिए। साथ में चॉक और आठ-दस मीटर लंबी एक रस्सी रखिए। ज़मीन पर एक बड़ा त्रिभुज बनाइए, इतना बड़ा कि हर भुजा पर छह-सात कदम लगें। पाँच-छह बच्चों से कहिए कि एक के पीछे एक, धीरे-धीरे उसकी लकीर पर चलें और हर कोने पर रुककर देखें कि वहाँ उनका शरीर क्या करता है। वे बताएँगे कि मुड़ना पड़ा। पूछिए, कितनी बार?

फिर बगल में एक वर्ग बनाइए और उस पर चलवाइए। अब बच्चे चार बार मुड़ते हैं, और उन्हें महसूस होने लगता है कि हर मोड़ एक जैसा है। इसके बाद उन्हें एक लंबे, पतले त्रिभुज पर चलवाइए, फिर ऐसे त्रिभुज पर जो करवट लेटा हो। क्या अब भी तीन ही बार मुड़ना पड़ा? अक्सर यहीं शक करने वाली बच्ची अपनी राय बदलती है। जो बात आँखें नहीं बता पाईं, वह पैरों ने बता दी।

अब रस्सी टोली को सौंप दीजिए और कहिए कि उससे कोई आकार बनाएँ, हर बच्चा एक कोना थामे। तीन बच्चे रस्सी पकड़ें तो वे कैसे भी खड़े हों, त्रिभुज ही बनेगा। चार बच्चे चार भुजाओं वाला आकार बनाएँगे और फिर मज़े से बहस करेंगे कि यह वर्ग है या नहीं। उन्हें भुजाएँ कदमों से नापकर ख़ुद पता करने दीजिए। वृत्त बनाना एक अच्छा अचरज है। एक बच्चा रस्सी का एक सिरा पकड़कर बीच में खड़ा रहे और दूसरा रस्सी तानकर उसके चारों ओर चक्कर लगाए।

आख़िर में बच्चों को उनकी स्लेट के पास वापस ले आइए। कहिए कि जिस आकार पर चले थे, उसे बनाएँ और जहाँ-जहाँ मुड़े थे, वहाँ निशान लगाएँ।

पूरे अभ्यास में बीस-पच्चीस मिनट लगते हैं। यह लगभग छह से ग्यारह साल तक के बच्चों के साथ अच्छा चलता है। जब कक्षा में आकारों का पाठ चल रहा हो, तब हफ़्ते में एक-दो बार इसे कीजिए। एक टोली चले तो बाक़ी कक्षा देखे और अंदाज़ा लगाए कि कितनी बार मुड़ना होगा। ज़मीन समतल और साफ़ हो, और बच्चे चलें, दौड़ें नहीं। अगर कभी आँखें बंद करके चलने का खेल जोड़ें, तो एक साथी बगल में चले, और जो बच्चा आँखें खुली रखना चाहे, वह खुली रख सके।

किन बातों पर नज़र रखें

जब अभ्यास असर कर रहा होता है, तो बच्चे बिना कहे कोनों पर धीमे हो जाते हैं और उनके हाथ भी बोलने लगते हैं। उस पल का इंतज़ार कीजिए जब कोई बच्चा आकार को देखना छोड़कर उस पर सोचने लगता है। “यह त्रिभुज ही होगा, हम तीन ही बार तो मुड़े थे।”

जब असर नहीं हो रहा होता, तो चलना दौड़ बन जाता है और कोनों पर किसी का ध्यान नहीं जाता। तब टोली को धीमा कीजिए और हर कोने पर सोच-समझकर रुकवाइए। जो बच्चा दूसरों के सामने चलना नहीं चाहता, वह रस्सी थाम सकता है, मोड़ गिनकर बोल सकता है, या बाद में चल सकता है। किसी बच्चे को हाथ पकड़कर पंक्ति में मत खींचिए। अगर कोई बच्चा सीधे-सादे मोड़ों पर बार-बार संतुलन खोता है या सीधी लकीर पर बिल्कुल नहीं चल पाता, तो माता-पिता से नरमी से बात कीजिए और किसी डॉक्टर या ऑक्यूपेशनल थेरेपिस्ट से जाँच करवाने की सलाह दीजिए।

यह क्यों काम करता है

सीमोर पैपर्ट ने अपनी प्रोग्रामिंग भाषा लोगो (Logo) की “टर्टल ज्योमेट्री” इस विचार पर खड़ी की थी कि बच्चे स्क्रीन के कछुए में ख़ुद को देख सकते हैं, और अपने चलते-फिरते शरीर के बारे में जो जानते हैं, उसे गणित तक ला सकते हैं। डगलस क्लेमेंट्स और जूली मेरेडिथ ने लोगो पर हुए शोध की समीक्षा में ज़्यां प्याज़े के सहारे यह बात रखी कि आकार के बारे में बच्चे के शुरुआती विचार क्रिया से पैदा होते हैं। उन्होंने लिखा कि सीधी राह पर चलने से बच्चे को सीधेपन का अनुभव मिलता है। साथ ही उन्होंने आगाह किया कि मोड़ को कोण के विचार से जोड़ने का काम शिक्षक को करना होगा।

क्लेमेंट्स और उनके साथियों ने पाया कि तीन से छह साल के बच्चे पहले-पहल आकारों को ज़्यादातर उनकी शक्ल से पहचानते हैं। चलना बच्चे के लिए समझ का दूसरा दरवाज़ा खोलता है। कारमेन पेट्रिक स्मिथ और उनके साथियों के एक अध्ययन में तीसरी और चौथी कक्षा के जिन बच्चों ने अपनी बाँहों से कोण बनाए, उनकी कोणों की समझ में अच्छा-ख़ासा सुधार हुआ, और हरकत पढ़ाने के दूसरे तरीक़ों के साथ मिलकर सबसे कारगर रही।

इसमें नया कुछ नहीं है। शुल्बसूत्र, जिनमें से कुछ ढाई हज़ार साल से भी पुराने हैं, नापने की रस्सी से वेदियाँ बनाने के नियम बताते हैं। बच्चे के पैर यहाँ जो सीखते हैं, वही करके जानना (enaction) है, यानी जानना शरीर का एक काम है। वह कहाँ है और कितना मुड़ी है, यह एहसास, यानी शरीर की अपनी स्थिति का बोध (proprioception), वह ठिकाना बन जाता है जहाँ कोने का विचार बसता है। तो असली आकार कौन-सा है, काग़ज़ पर बना हुआ, या वह जिस पर बच्चा चलकर आया?

यह क्यों काम करता है, इसकी जड़ें: R2 Enaction: knowing as a form of doing; R8 Proprioception: the forgotten sense of learning; R35 Piaget: intelligence begins in movement

शरीर से संख्या में अगला अभ्यास: P34 Number lines children stand on

संदर्भ (Notes)

  1. Papert, S. (1980). Mindstorms: Children, Computers, and Powerful Ideas. New York: Basic Books.
  2. Clements, D. H., & Meredith, J. S. (1992). Research on Logo: Effects and Efficacy. Logo Foundation. el.media.mit.edu
  3. Clements, D. H., Swaminathan, S., Hannibal, M. A. Z., & Sarama, J. (1999). Young children’s concepts of shape. Journal for Research in Mathematics Education, 30(2), 192–212. doi.org/10.2307/749610
  4. Smith, C. P., King, B., & Hoyte, J. (2014). Learning angles through movement: Critical actions for developing understanding in an embodied activity. Journal of Mathematical Behavior, 36, 95–108. doi.org/10.1016/j.jmathb.2014.09.001
  5. O’Connor, J. J., & Robertson, E. F. (2000). The Indian Sulbasutras. MacTutor History of Mathematics, University of St Andrews. mathshistory.st-andrews.ac.uk

Ages 6–8Ages 8–11For teachers

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